प्रिय मुनिया,
तुम्हें ये तीसरा पत्र लिखते हुए मुझे बहुत खुशी हो रही है। मैं तुम्हें ये पाती तब लिख रहा हूँ, जब तुम ठीक एक माह की हो गई हो। तुमने 27 जनवरी 2022 को इस ख़ूबसूरत दुनिया में कदम रखा था। अब 27 फरवरी को एक माह हो गए हैं। ये एक माह तुम्हारे साथ यूँ बीता है कि जैसे हम अपने बचपन को निहार रहे हों। तुम्हारे बहाने मैं और तुम्हारी माँ अपने-अपने बचपनों में लगातार झाँक रहे हैं। गोया कि तुम हमारे बचपन को फिर से देखने का कोई अतीत का द्वार हो। ये बहुत ख़ूबसूरत अहसास है मेरी लाडो। इसे मैं शब्दों में कैसे बयान करूँ।
दो मित्र थे। वे हर शनिवार की शाम एक वेश्या के पास जाया करते थे। एक शाम जब वे वेश्या के घर जा रहे थे, तभी उनकी दृष्टि रास्ते में एक कथा-स्थल पर पड़ी। वहाँ कोई संत कथा सुना रहे थे। तब पहला मित्र ने दूसरे से कहा, “आज आप आनन्द हेतु जाइए। मैं कथा सुनूँगा।” इसके बाद दूसरा मित्र पहले को छोड़कर आगे बढ़ गया। लेकिन कथा सुनने बैठा मित्र उसे नहीं छोड़ पाया। वह अब उसी के बारे में सोचता रहा कि वह जीवन के सुख ले रहा होगा। और मैं यहाँ बैठा हूँ। ऐसी जगह, जहाँ त्याग, तपस्या की बातें हो रही हैं। अभी इन सबकी मेरी आयु कहाँ है। मेरा मित्र कहीं अधिक बुध्दिमान है, क्योंकि मेरी तरह आध्यात्मिक प्र
प्रिय मुनिया,
महत्त्वपूर्ण तत्त्वों की चर्चा में अजीव की भी चर्चा आवश्यक है। यह अजीव ही तो है जिसे हम देख पाते हैं। स्पर्श कर पाते हैं। जैन आचार्य कहते हैं जो जीव नहीं, वह अजीव है। जीव का विपरीत अजीव है। अर्थात् जिसमें चेतना नहीं है, जिसमें ज्ञान नहीं है, वह अजीव की श्रेणी में आता है।
प्रिय मुनिया,
हम श्रृंखला के पिछले भाग में ‘जीव’ को समझने की कोशिश कर रहे थे। जीव चेतना युक्त हो, विवेक पूर्ण हो आदि। उसकी एक विशेषता थी ज्ञानवान होना।
यह ज्ञान बड़ी विचित्र चीज है। इसकी विशेषता है कि हर जीव खुद को ज्ञानवान ही समझता है। इसी ज्ञानवान होने की अनुभूति के कारण ही एक जीव अन्य से प्रेम या ईर्ष्या करता है।
इस ज्ञान की अनुभूति जीवों में प्रेम और ईर्ष्या का कारण ही नहीं अपितु हिंसा और अपराध तक का कारण बनती है। विविध धर्मों के मानने वाले प्रतिधर्म वाले के प्रति वैरभाव तक रखते हैं।
हो आज रंग है री...आज रंग है री। तन - मन अधिक उमंग हर्षायो।
बृज की होरी कान्हा की पिचकारी, गोपियन की रंग-रास बरजोरी। अंगिया-भंगिया संग कान्हा-किशोरी। मन ललचा गयो मोरा फाग ने हिलोरी। हो आज रंग है री सखी...आज रंग है री।
सखियां कहें मोसे कहाँ गओ कान्हा, मैंने कह दयो रंग में सिमट गओ..भंग में सिमट गओ...मोरे अंग में लिपट गओ। बो तो उलझ गओ मोरे गेसुअन में, हमहुँ अरझ गये कान्हा की अंखियन में...सखी री बांकी बतियन में...रास और रसभरी रतियन में। हो आज रंग है री सखी...आज रंग है री।
ज़िन्दगी एक लम्बा ट्रैफिक है। आने-जाने वाले वाहनों की भीड़ है। छोटे-बड़े वाहन सड़क पर हर तरफ पसरे हैं। कोलाहल है, आवाज़ें हैं। कर्कश शोर है और धूल-धुआँ लगातार हर पल हर जगह बना हुआ है। मैं इसके बीच से गुजरता हूँ और हर झटके और छोटे-बड़े वाहनों के टल्ले से रोज अपने को बचाकर ले आता हूँ। गहरे अवसाद और तनाव के क्षणों में मेरा खालीपन, मेरी उदासी यह सब याद करके अपनी पीठ थपथपाती है। बहादुर होने का ख़ुद को ही ख़िताब देती है कि मुफ़लिसी के चरम दिनों में और इस क़दर व्यस्त संसार को अनथक देखते-समझते हुए तुम फिर लौट आए जीवन में। किसी के पास समय नहीं कि काँधे पर दो पल महीन सा एक गर्म हाथ रख दे और पूछ ले कि ठीक तो हो
श्रृंखला में पीछे हम जैन दर्शन के अन्तर्गत जीव या आत्मा की चर्चा कर रहे थे। आत्मा वही जो जीव है। जिसमें चेतना है। जिसमें बोध अर्थात् जिसमें समझ हो। जिसमें ज्ञान हो। जिसमें विवेक हो। वह जीव है। ‘आत्मा’ यह शब्द दर्शन के क्षेत्र में बड़े महत्त्व का है। ‘मैं’ यह बोलने वाला ‘मैं’ आत्मा है, अगर ऐसा कहें तो अनुचित नहीं होगा। यह ‘मैं’ जीव ही कह सकता है। जीव में ही ‘मैं’ होने का भाव रहता है। जैन आचार्य जीव के कई भेद करते हैं। इनमें संसारी और मुक्त भेद महत्त्वपूर्ण हैं। इसमें संसारी और मुक्त भेद का अंतर एक कथा से समझने का प्रयास करते हैं।
फिल्म ‘कश्मीर फाइल्स’ को लेकर सोशल मीडिया पर जारी बेइंतिहा गहमागहमी से सभी वाक़िफ़ हैं। फिल्म को लेकर कश्मीरी पंडितों के अनुभव से लेकर विरोध में उठ खड़े हुए पब्लिक इंटलेक्चुअल्स स यह पता तो लग ही जाता है कि इससे जमीन हिली है। सो, इसका जायज़ा लेने के लिए एक लंबे अरसे के बाद आज आइनॉक्स जाना हुआ। वहाँ ‘कश्मीर फाइल्स’ फिल्म