देखी-सुनी

कुमार गन्धर्व : जिनके गाए ‘निर्गुण’ से गुण-अवगुण परिभाषित कर पाता हूँ!

संदीप नाईक, देवास, मध्य प्रदेश से, 8/4/2021

भारतीय मनीषा, विलक्षण संगीतकार और महान गायक पंडित कुमार गंधर्व का आज जन्मदिन है। कर्नाटक से मालवा के देवास में आ बसे। फिर यहीं जीवनभर संगीत और सुरों की आराधना करते रहे। आज उनके गाए कबीर को सुनकर ही मेरे जीवन की गुत्थियाँ सुलझती हैं। उन्हीं के निर्गुण (भजन) से जीवन में गुण-अवगुण को परिभाषित कर पाता हूँ। उन्हीं से सीखा है, "जब होवेगी उमर पूरी, तब टूटेगी हुकुम हुजूरी। उड़ जाएगा हंस अकेला।"

प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार)

निर्मल वर्मा की जयन्ती और एक प्रश्न, किताबों से बड़ा ज्ञान या ज्ञान से बड़ी किताबें?

टीम डायरी, 3/4/2021

किताबें ज्ञान का स्रोत हैं या फिर ज्ञान किताबों के सृजन का माध्यम? इस प्रश्न पर विचार का भरा-पूरा कारण दिया है इस कविता ने। प्रश्न के मद्देनज़र इस कविता की हर लाइन गौर करने लायक है।  

प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार)

कुछ ऐसा कीजिए उपाय, सारी कड़वाहट दूर हो जाए

आकाश कुमार सिंह, छपरा, बिहार से, 28/3/2021

होली त्यौहार है रंग का, उमंग का। पर अगर दिलों में कड़वाहट घुली हो तो जीवन में न कोई उमंग रह जाती है, न रंग। इसीलिए हर साल होली आती है। हमारे बीच की कड़वाहट मिटाने के लिए। रंग और उमंग चढ़ाने के लिए। हालाँकि एक होली के दिन तो शायद यह सम्भव हो भी जाता हो, मगर क्या साल के पूरे 365 दिन, हर दिन हम कड़वाहट भूलकर रंग, उमंग के साथ रह पाते हैं? ज़वाब इसका बहुतों के लिए मुश्किल हो सकता है। 

अहो! भारत के तेज से युक्त यह होली दिख रही है..

टीम डायरी, 25/3/2020

जिस उम्र में लोग आधुनिकता और दुनियावी चमक-दमक के पीछे भागते हैं, उस उम्र में कुछ युवा ऐसे भी हैं, जो संस्कृत और संस्कृति को चमका रहे हैं। उसे निखार रहे हैं। उसकी नई परिभाषाएँ गढ़ रहे हैं।

ऐसे युवाओं में कुछ नाम हैं - शुभम आर्यन्, गौरव मलिक, शौर्य नान्दल और संजू नान्दल। इन युवाओं ने 25 मार्च को ही एक वीडियो ज़ारी किया है। होली के अवसर पर, संस्कृत भाषा में, भारतीय संस्कृति के रंगों से सजे पर्व की शुभकामनाएँ देने के लिए।

वीडियो में सुने जा रहे गीत के बोल हैं...

काश, ‘26 जनवरी वाले वे बड़े लोग’ इस बच्चे से रह जाते! 

टीम डायरी, 13/3/2021

वीडियो में दिख रहा ये छोटा सा बच्चा दिल्ली के मयूर विहार स्थित रयान इंटरनेशनल स्कूल में पढ़ता है। धैर्य जोशी नाम है इसका। इसी 26 जनवरी की बात है, जब ये सज-धजकर अपने ‘गणतंत्र दिवस’ और उसकी अहमियत के बारे में चन्द पंक्तियाँ बोल रहा था। निश्चित रूप से उसके शिक्षकों या माता-पिता ने उसे ये पंक्तियाँ रटवाई होंगी। पर उसने उन्हें इस ख़ूबसूरती से निभाया कि वहाँ मौज़ूद लोग उसे अपने मोबाइल कैमरों में कैद करने से ख़ुद को रोक नहीं पाए। 

प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार)

खोल दो बन्धन इनके, हर मंज़िल पा जाएँगी!

टीम डायरी, 8/3/2021

माँ अब बदल रही है। पर कितनी, कहाँ। और कहाँ नहीं। वक़्त के साथ उसका बदलना कितना ज़रूरी है। इस कविता में ऐसे कुछ पहलू छूने की कोशिश की गई है। कविता के साथ ही महिलाओं की तरफ़ एक महिला की महात्वाकाँक्षी पुकार भी है.. ..‘खोल दो बन्धन इनके, हर मंज़िल पा जाएँगी!

प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार)

जीभ की उम्र लम्बी क्यों होती है?

शिखा पांडे, अहमदाबाद, गुजरात से, 28/2/2021

जीभ की उम्र लम्बी क्यों होती है? बहुत प्रासंगिक और रोचक-सोचक सा सवाल है। ज़वाब सोचना चाहें तो सोच सकते हैं। अगर सुनना चाहें तो यह कहानी सुनी जा सकती है। छोटी है, पर सवाल का ज़वाब पूरा देती है। 

सुकून वहाँ नहीं जहाँ हम ढूँढ़ते हैं

रैना द्विवेदी, भोपाल, मध्य प्रदेश से, 25/2/2021

जीवन की आपाधापी। तरक्की के ऊँचे पायदान। खूब पैसा। तमाम सुविधाएँ। लेकिन क्या इन सब को पाकर हम खुश हैं? संतुष्ट हैं? हमारा मन शान्त है?

इन सवालों के ज़वाब अधिकांश लोगों के पास ‘नहीं’ में ही हो सकते हैं। इसीलिए यहाँ फिर सवाल हो सकता है कि आख़िरकार ऐसा क्यों है कि जिन चीजों के पीछे हम भाग रहे हैं। जिन्हें हम कुछ हद तक हासिल भी कर रहे हैं। उन्हें पाकर, उनके लिए कोशिश कर के भी हमें आनन्द क्यों नहीं मिलता? 

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संगीत और साहित्य का नगरकीर्तन

टीम डायरी, 17/2/2021

नगर कीर्तन, सदियों पुरानी एक विशुद्ध भारतीय परम्परा। सुबह-सुबह कुछ लोग जब हरिनाम संकीर्तन, भक्तिपद गाते हुए हमारे दिन को ‘सुदिन’ बनाने के मकसद से गलियों, चौक-चौबारों से गुजरते हैं, तो वह ‘नगर कीर्तन’ कह दिया जाता है। यही नगर कीर्तन तब ‘प्रभात फेरी’ हो जाता है, जब समाज में जागरुकता लाने, लोगों का ध्यान किसी मसले की तरफ़ खींचने के लिए उस विषय का काव्य कहते हुए लोगों के समूह यूँ ही हमारे दरवाजों से गुजरा करते हैं। मिसाल के तौर पर बहुत लोगों को बचपन की प्रभात फेरियाँ अब भी शायद भूली न होंगी। हर 15 अगस्त की सुबह विद्यालयों की गणवेष (Uniform) पहने बच्चे आज़ादी के तराने गाते, हमें सुनाते निकला करत

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किसी का पत्थर, किसी के लिए हीरा

शिखा पांडे, अहमदाबाद, गुजरात से, 5/2/2021

कई बार कहा सुना गया है कि ‘हीरे की कीमत, जौहरी ही जानता है’। लेकिन क्या हमने इसी कहावत के दूसरे पहलुओं को भी जाना-समझा है? मसलन, इसका एक दूसरा पहलू कि ‘कोई पत्थर दरअसल हीरा होता ही तब है, जब वह सही हाथों में पहुँचता है।’ और तीसरा ये कि ‘जब तक पहचाना न जाए, तराशा न जाए, पत्थर हीरा नहीं होता।’ बहुत थोड़े से फर्क के साथ कही गई ये तीनों बातें अहमियत बड़ी रखती हैं। अपनी-अपनी, अलहदा। 

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