डायरीवाणी (पॉडकास्ट)

प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार)

संवेदना : एक कहानी, गाय-बछड़े और दो चादर में छिपी भावनाओं की

रैना द्विवेदी, भोपाल, मध्य प्रदेश से, 10/12/2020

अख़बारों में अक्सर ही छपने वाली छोटी-छोटी कहानियों पर हम में से कितने लोग ध्यान देते हैं? शायद ही कुछ लोग देते हों। बावज़ूद इसके कि इन कहानियों में बड़ी मर्म की बातें लिखी होती हैं। तिस पर इनके पीछे किसी न किसी का हुनर भी तो होता है। कोई ऐसा, जो अपनी पहचान, अपने रचनाधर्म के लिए छटपटा रहा होता है। हम सबके लिए बड़ी शिक्षाएँ इनमें छिपी होती हैं। अपने बच्चों को मार्गदर्शन देने का रास्ता हमें दिखाती हैं। अपने साथ किसी को सुनने, समझने-बूझने  के नुस्खे हमें दे जाती हैं। और न जाने कितना-कुछ होता है, इनमें। ये कहानियाँ बोलती नहीं हैं, पर कहती बहुत-कुछ हैं।

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एक बच्ची की चाहत- मैं मोबाइल बनना चाहती हूँ

शिखा पांडे, अहमदाबाद, गुजरात से, 16/10/2020

एक कहानी छोटी सी.... 

उस रोज पेशे से स्कूल शिक्षक सीमा अपनी कक्षा के बच्चों की कॉपियाँ जाँचने के लिए घर ले आई थीं। घर के रोज़मर्रा के कामों से फ़ारिग होने के बाद इत्मीनान से वह बैठक में कॉपियाँ जाँचने बैठी थीं। पति बगल में अपने मोबाइल पर वीडियो गेम खेलने में व्यस्त थे। हमेशा ही रहते थे। बहरहाल, जाँचने के लिए अभी पहले बच्चे की कॉपी का पहला पन्ना ही सीमा ने खोला ही था कि कुछ समय बाद उनके हाथ कॉंपने लगे। आँख से आँसू बहने लगे। आगे सब धुँधला सा गया। 

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ऐसे बढ़िया उच्चारण के साथ ‘श्रीगणेश स्तोत्र’ सुनने मिलना वास्तव में सुखद अनुभूति देता है

चेतन वेदिया, दिल्ली से; 23/8/2020

पूरा देश इन दिनों गणपति बप्पा की आराधना में जुटा है। उनसे कामना कर रहा है, विनती कर रहा है कि वे अपने ‘विघ्नहर्ता’ स्वरूप के प्रभाव से देश और दुनिया को कोरोना महामारी के संकट से मुक्ति दिलाएँ। ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:, सर्वे सन्तु निरामय:’ का सभी जीव-जनों आशीष दें। ऐसी कामनाओं, विनतियों के बीच ही अगर हमारी परिष्कृत भाषा ‘संस्कृत’ में भगवान गणेश की स्तुति, वह भी बढ़िया और सधे हुए उच्चारण के साथ सुनने मिल जाए तो क्या कहने। उससे होने वाली सुखद अनुभूति को शब्दों में बयान करना आसान नहीं है। पर इस अनुभूति से गुजरना सम्भव हो पाया है।

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माँ के रूप में मेरी ज़िन्दगी का सबसे यादग़ार लम्हा, जब बेटी ने पूछा- मम्मा, मैं आपके जैसी कब बनूँगी?

शिखा पांडे, अहमदाबाद, गुजरात से ; 10/ 8/2020

मैं शिखा पांडे। अहमदाबाद में अपने छोटे से, प्यारे से परिवार के साथ रहती हूँ। मेरी दो प्यारी सी बेटियाँ हैं। अमिषी और श्रीतिजा। आज सुबह की बात है। मैं कुछ काम कर रही थी। तभी अमिषी मेरे पास आई और बोली, “मम्मा! मैं आपके जैसी कब दिखूँगी? आपके जैसी कब बनूँगी?” मैंने उससे पूछा, “तुम्हें मेरे जैसा बनना है? मेरे जैसा दिखना है?” तो उसका ज़वाब आया, “हाँ मम्मा!

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