प्राचीन काल में काशी राज्य पर ब्रह्मदत्त नाम के राजा राज्य करते थे। कहते हैं, उन्हीं के समय में एक पहाड़ी पर बोधिसत्त्व (बुद्ध) ने वृक्ष के रूप में पुनर्जन्म लिया। वे आसपास के क्षेत्रों में रहने वालों के आचार-विचार पर ध्यान रखते थे। उसी पहाड़ी के पास घाटी में एक गुरुकुल था। एक विद्वान पंडित वहाँ के आचार्य थे। वे अपने कुछ शिष्यों के साथ गुरुकुल में रहते थे। एक बार अनजाने में आचार्य से कोई पाप हो गया। उस पाप से मुक्त होने के लिए उन्होंने एक व्रत रखने का निश्चय किया। उस व्रत के नियम के अनुसार उन्हें एक बकरे की बलि देनी थी। इसलिए आचार्य ने किसी धनी व्यक्ति से एक बकरा माँगा। ब
बहुत पुरानी बात है। बोलपुर (पश्चिम बंगाल) के स्टेशन पर आधी रात थी। छोटा सा स्टेशन और मुसाफ़िरख़ाने में सात-आठ यात्री इन्तज़ार कर रहे थे। झपकी ऐसी लगी कि मेरा सहयात्री मुझे जगाता रहा पर मैं नहीं जागा। वह चला गया, सदा के लिए। कुछ यात्राएँ कभी पूरी नहीं होतीं। वे भीतर ही भीतर चलती हैं। वे छोड़ती नहीं अपना दारुण्य और वैभव।
भगवान बुद्ध अपने अन्तिम उपदेश में बड़ी कठोर बात करते हैं। हालाँकि अभी तक हम बुद्ध को जहाँ भी देखते हैं हमेशा सौम्य, शान्त, सहज दिखाई देते हैं। लेकिन अन्तिम उपदेश के समय बुद्ध कठोर हो उठते हैं। सदा क्षमा करने वाले बुद्ध दंड देने की बात कहते हैं।
दरअसल, हर किसी को क्षमा करना सम्भव भी नहीं। बुद्ध सौम्य हैं। लेकिन व्यवहारिक भी हैं। बुद्ध केवल श्रद्धा की बात करते तो अपने उपदेश कैसे करते? श्रद्धा रहती तो प्राचीन सिद्धान्तों को यथावत् ही न मान लेते? अपने नए व्यवहारिक उपदेशों की आवश्यकता ही क्या थी?
‘न्यूटन’ फिल्म में अभिनेता राजकुमार राव दूरस्थ आदिवासी गाँव में चुनाव करवा रहे हैं। वे बूथ पर अपने सहयोगियों से पूछते हैं कि क्या वे निराशावादी हैं? ये सवाल जब वे अभिनेत्री अंजलि पाटिल से पूछते हैं तो वे जवाब देती हैं, "नहीं सर मैं आदिवासी हूँ" और राजकुमार राव चुप हो जाते हैं। इस ज़वाब का क्या मतलब है? यही कि जो जल, जंगल, ज़मीन पर निर्भर है, जिसने प्रकृति से जीवन को जोड़कर अपने को दुनिया से मुक्त कर लिया है, जिसने न्यूनतम साधनों से जीवन की लय को जोड़कर मस्त रहना सीख लिया है, वह निराशावादी हो नहीं सकता। कबीर कहते हैं, "जब मन मस्त हुआ तो फिर क्या बोले।" आशा यहीं से उपजती है। ---
जब भी बुद्ध को पढ़ता हूँ तो पाता हूँ, आधुनिक भारत के बौद्ध व्याख्याकारों और बौद्धधर्मियों ने बुद्ध को सनातन के विरुद्ध खड़ा कर दिया है। इसका दुष्परिणाम यह हुआ भारतीय भूमि से जन्मा बुद्ध धर्म धीरे-धीरे अपनी ही धरती से अलग हो गया। जबकि बुद्ध तो मूल रूप से सनातन के अतिकर्मकांडो की श्रृंखलाओं के परिहार के लिए खड़े हुए थे, बस।
हम सब स्तब्ध हैं। निशब्द हैं। दिमाग़ पंगु हो गया है। यदि कोई इस समय ज़रूरी मुद्दे या काम की बात कर ज्ञान-विज्ञान, समाज, संस्कृति, राजनैतिक बिन्दुओं आदि पर अपनी पारंगतता दर्शाता है, तो माफ़ कीजिए वह मनुष्यता की सीमा से परे हो चुका है। ---- अभी-अभी हमने सड़कों पर छाले लिए चलती लाशों के हुज़ूम देखे हैं। गर्भवती, धात्री एवं सद्य प्रसूताओं के साथ नवजात शिशुओं को देखा है। वे किसी कारवाँ में चल रहे थे। हमारे देखते-देखते तड़प कर गिर पड़े। उनकी इहलीला समाप्त हो गई। -----
गाँधी जी भारत की तरह चिरन्तन हैं। वे भारत की महानता, बल, कमजोरी, सीमाएँ और सम्भावनाओं के प्रतीक हैं। जयन्ती के बहाने एक बार फिर हम उनकी और अपनी हक़ीक़त का जायज़ा लेने का प्रयास करते हैं।
स्वातंत्रोत्तर मुख्यधारा के इतिहास में गाँधी जी भारतीय गणराज्य के नैतिक, संवैधानिक और राजनीतिक मूल्यों के स्रोत के रूप में अवतरित होते हैं। वे युगपुरुष हैं, जिनमें अपने देश-काल के धर्म, नीति और राजनीतिक-सामाजिक परिस्थिति की विहंगम दृष्टि और समझ है। समकालीन समाज को दिशा देने का प्रबल पुरुषार्थ है।
बुद्ध की विशेषता है कि वे एकदम उपदेश देना शुरू नहीं कर देते। घूमते-फिरते बैठे सामान्य पर्यावरण में सहज होकर मित्रवत् बातें करते हुए अपने उपदेशों का कथन कर देते हैं। इसी कारण बुद्ध सरल हैं, बोधगम्य हैं।
ऐसे ही बुद्ध एक बार श्रावस्ती के जैतवन में भ्रमण कर रहे थे। उस अवसर पर मालुंक्यपुत्त ने बुद्ध से संसार के शाश्वत - अशाश्वत, जीव, देह की भिन्नता, अभिन्नता आदि के बारे में प्रश्न पूछे।
आसमान में जब भी देखा, एक नहीं हजार आकार नजर आए। भिन्न-भिन्न प्रकार के। किसी ने उनके हू-ब-हू चित्र बना दिए। किसी ने मिट्टी से गढ़ दिया इन आकारों को। किसी ने देखकर छोड़ दिया। कुछेक ने ऊपर आसमान देखा नहीं और किसी को कुछ दिखा ही नहीं। ----
बुद्ध बड़े मनोवैज्ञानिक व्यक्ति हैं। उन्होंने मनुष्य के मन को समझा और पाया कि मनुष्य हर समय पाप-पुण्य के फेर में पड़ा रहता है। इसलिए उन्होंने अंत:करण शुद्धि पर पूरा जोर दिया। इस अंत:करण शुद्धि के लिए बुद्ध नैतिक आचरण की उदात्तता के पालन का उपदेश देते हैं।