आसमान खाली है, एक सिर्फ़ सूरज चमक रहा है। सुबह से सन्देश आ रहे हैं कि आज छह ग्रह एक पंक्ति में रहेंगे और यह समय 500 वर्षों बाद आया है। अर्थात फिर आएगा। हो सकता है तब हम सब ग्रह नक्षत्रों के साथ एक पंक्ति में साथ खड़े हो जाएँ। फिर सब कुछ ख़त्म भी हो जाए। मैं कल्पना करता हूँ कि किसी अज्ञात जगह और किसी व्योम में सब टँगे हैं और चर- अचर में भेद मिट गया है।
कमाल खान नहीं रहे... सुबह से इस ख़बर पर यकीन मुश्किल हो रहा है। अब भी जब ये टिप्पणी टाइप कर रहा हूँ तो समझ नहीं आ रहा है कि क्या और कैसे लिखा जाएगा। उनसे कभी मिला नहीं था। बस, उनकी रिपोर्ट देखीं थीं, यूट्यूब पर ढूँढ़कर देखा-सुना था। कोशिश रहती थी कि जब भी मौका मिले तो उन्हें देखा और सुना जाए...
सावित्री बाई फुले का आज जन्मदिवस है। तत्कालीन समाज में जिस तरह से संघर्ष करके उन्होंने लड़कियों की पढ़ाई के महत्व को समझा और लड़कियों की शिक्षा के लिए काम किया, वह सराहनीय है। इतिहास में यह सब सफलता के रूप में दर्ज है।
भगवान महावीर के शिष्य ने एक बार प्रश्न किया, “गुरुदेव, मनुष्य के अधोपतन का क्या कारण है और उससे अपनी मुक्ति के लिए क्या किया जाना चाहिए?”
इसका उत्तर देने के बजाय महावीर ने प्रश्न किया, “यदि कोई कमंडलु भारी है और उसमें पानी भी अधिक मात्रा में समा सकता हो, तो क्या वह खाली अवस्था में छोड़े जाने पर डूबेगा?”
“कदापि नहीं,” शिष्य ने उन्हें ज़वाब दिया, “बस, उसमें कोई छिद्र न हो।”
जीने की सम्भावनाओं के बीच हम जीने के बजाय अमर होने की चाह लिए रहते हैं। अपने हर कर्म, विचार को इस कसौटी पर तौलते हैं कि मेरे बाद मेरे साथ यह संलग्न न रहे, या मुझे यश देकर अमर कर दे। इस सबमें जीने का मज़ा भूलते हैं। याद रखना चाहिए कि मरने के बाद तो हम कम से कम हजार वर्ष ज़िन्दा रहेंगे ही। जब तक कि हमारी स्मृतियाँ किसी न किसी में क्षणांश भर के लिए भी बनी हैं। पर आज जो अपने ज़ेहन में सुखद स्मृतियों के बजाय अवसाद, तनाव और कटुता एकत्रित कर रहे हैं, उससे तो जीने का मज़ा ही खत्म हो जाएगा। सब भूलकर बस आनन्द से जी लो, कोई किसी को न सुधार सकता है, न बिगाड़ सकता है। और न ही आप-हम पर
जो चीज जैसी है, उसे वैसे ही जानना, न कम, न ज़्यादा, अवस्था के अनुरूप जानना, उसका सम्यक् बोध होना ही सम्यक् ज्ञान है। सम्यक् ज्ञान क्या नहीं है? यह जानना सम्भवत: सम्यक् ज्ञान से ज्यादा महत्त्वपूर्ण हो गया। सम्यक् ज्ञान के अभाव में हम अक्सर दूसरों को तो चोट पहुँचाते ही हैं। उससे भी अधिक ख़ुद को आत्मिक चोट देते रहते हैं। सबसे बड़ी बात इस आत्मिक क्षति का अहसास हमें अक्सर नहीं हो पाता।
आसमान में एक लम्बी सफ़ेद धुएँ की लकीर रह गई है। मानो कोई बहुत तेजी से गुजरा हो अपने पीछे पूरा ग़ुबार छोड़कर। इस सबके साथ सफ़ेद बादलों का झुंड, घर लौटते पक्षियों के समूह जिनका रंग साफ़ नज़र नहीं आता। ऊँचे टॉवर, उनसे ऊँचे पेड़ और क्षितिज की तलाश में सूरज का पीछा करते जाना और अन्त में जहाँ से मैं देख रहा हूँ, डूब जाना। क्या यही हश्र रह गया है जीवन का?
पृथ्वी पर तीन रत्न हैं। पहला- जल, दूसरा- अन्न और तीसरा- अच्छे बोल (पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि जलमन्नं सुभाषितम्)। हम अक्सर जो भी बेहतर होता है, उसके प्रति उदासीन ही रहते हैं। क्योंकि हम एकदम आकर्षित करने वाली चीजों के प्रति आसक्त रहते हैं। यह एक सामान्य स्वभाव है और इसको बदलना कठिन है। इसीलिए कठिन चीजों को अपनाना तप हो जाता है। तप सामान्य सी दिखने वाली चीजें अपनाना भी है। इसलिए भगवान महावीर ने अपने उपदेशों में तीन रत्नों की चर्चा की है। जो जैन मत के मुख्य आधार हैं। पहला- सम्यक् दर्शन, दूसरा- सम्यक् ज्ञान और तीसरा- सम्यक् चरित्र। इनमें सम्
परछाइयाँ बहुत गहरी हैं। हम सब बहुत तकलीफ़ में हैं। उम्र का लम्बा पड़ाव बीत गया है और कुल जमा हासिल अगर यह था या ये होने वाला था तो ज़िन्दगी की सभी शर्तें नामंज़ूर हैं और मैं सब लौटाकर फिर से शून्य पर लौटना चाहता हूँ। एक नई ताक़त और जोश के साथ, नई दिशाएँ तलाशने और वो सब कुछ पाने को जो खिलन्दड़पन से हासिल हो सकता है। मुझे नहीं चाहिए ये ख़ौफ़, वहशत और अंधेरे बन्द कमरों की सौग़ातें।
भीड़भरे शहरों में अक्सर रहा हूँ, जहाँ ट्रैफिक सिग्नल को देखते-समझते ही उम्र के दशक गुजरते जाते हैं। हम भीड़ में फँसे हों और सामने की गाड़ियाँ सरक रही हों, तो दस बार लाल-हरी बत्ती को देखते-देखते अधीरता भी ख़त्म होने लगती है। एक उकताहट सी होने लगती है। अन्त में जब हमारा नम्बर आता है तो अक्सर हमें लाल और हरे के बीच पीले वाले समय मे क्रॉस करना पड़ता है। जीवन इसी का नाम है, ख़तरों और सुरक्षित घेरे के बीच से निकलकर पार हो जाना।