शोर में बहुधा एकांत छिन जाने का खतरा रहता है। पर कुछ शोर मन को बहुत भाते हैं। मसलन- चिड़ियों की चहचहाट, टिटहरी की चीख, मुंडेर पर कौवों का क्रन्दन, नदियों में उद्दाम वेग से बहते पानी का कलकल भरा आलाप, समुद्र में चिंघाड़ भरती लहरों का शोर। किसी शंख को कान में लगाकर देर तक अनहद नाद को सुनना। जंगल में किसी सूनी पगडंडी से गुजरते हुए पत्तियों और झूमती मदमस्त शाखाओं का संगीत। मंडला (मध्य प्रदेश का शहर) में गोंड राजा के किले में असंख्य चमगादड़ों का शोर, जो उजालों से घबराकर सदियों से एक कमरे में भटक रहे हैं। पहाड़ों के उत्तुंग शिखर पर चढ़ते हुए पत्तों और घास की सरसराहट या अपने कम
भगवान बुद्ध दुःख के कार्य-कारण बताते हैं। इसमें दुःख समुदाय, यह दूसरा आर्यसत्य है। दुःख है तो दुःख के कारण भी होते ही हैं। इन कारणों को तृष्णा के नाम से भी जाना जाता है। यह तृष्णा किसी भी प्रकार की हो सकती है। धन की, भोग की, प्रसिद्धि की या अन्य कई तरह की। धर्म-पालन की भी हो सकती है।
देवास के जवाहर चौक में एक ही बड़ी सी दुकान थी झँवर सुपारी सेंटर। मंगरोली सुपारी वहीं मिलती थी, जिसे काटो तो नारियल जैसी लगती थी। घर में एक सरोता था जिसकी धार कुन्द हो चुकी थी। माँ को आदत थी, सुपारी खाने की। एक बैठक में आधी सुपारी खा जाती थीं। एक बार उसी सरोते से मैं भी सुपारी काटने लगा। उंगली कट गई, खून बहने लगा। घबराए तो सब थे, मैं भी, पर डरा नहीं था।
भगवन बुद्ध ने दु:ख को पहला सत्य बताया। बड़े अद्भुत हैं बुद्ध। बहुत लम्बी-चौड़ी बात नहीं करते। एक शब्द में बता दिया कि समस्या क्या है।
रास्ते की धूप में ख़ुद ही चलना पड़ता है। चाहे नरम धूप हो या कड़क। सब देह को ही सहना है। धूप जब भीतर आत्मा तक छनकर पहुँचेगी तो हम छाँव की तलाश करेंगे। किसी घनी छाया वाले पेड़ के नीचे जाएँगे। वह मौलश्री का हो, बबूल या देवदार का। छाया का कोई रंग नही होता। धर्म और विश्वास तो बिल्कुल नहीं।
भगवान बुद्ध ने पंचवर्गीय भिक्षुओं को अपनी बात सुनने के लिए मना लिया। तथागत ने उन्हें समझाया। उनकी रुचि देख जो पहला उपदेश दिया वह धर्मचक्र प्रवर्तन ( संयुक्त निकाय 55।2।1 बुद्धचर्या ) कहलाया।
उन्होंने कहा : भिक्षुओ, दो अतियों का सेवन नहीं करना चाहिए।
भिक्षु : वे कौन-सी हैं?
बुद्ध : प्रथम अति है हीन, ग्राम्य तथा पृथक्जनों के योग्य, अनार्य, अनर्थों द्वारा सेवित, काम-वासनाओं द्वारा प्रेरित काम-सुख में लिप्त नहीं रहना चाहिए।
भिक्षु : और दूसरी अति कौन सी है?
अड़सठ घाट भीतर हैं। कहाँ जाना है? न गंगा, न यमुना, सुमिरन कर ले मेरे मना, मन चंगा तो कठौती में ही गंगा है। बीती जा रही है सबकी उमर पर हम मानने को तैयार ही नहीं हैं। इसी घट अन्तर और बाग-बगीचे हैं पर भागना रुक नहीं रहा है। सोचने-समझने को तैयार नहीं हैं।
हमने कन्दराओं में बैठे साधु देखे। जमीन की तलहटी में ईश्वर। पहाड़ों पर देवियाँ। नदियों की धार में साक्षात प्रकृति की लीला। समुद्र का रौद्र रूप। आसमान से बरसता नेह और आग भी। चमत्कारों के बीच अपने पैदा होने को भी प्रारब्ध माना। जब मौत की आगोश में समाए तो शाश्वतता और क्षणभंगुरता भी समझ आई।
वन में वैशाख पूर्णिमा को जन्मा राजकुमार फिर वन की तरफ चल दिया। पुनः जन्म लेने हेतु। वह राजगृह के घने वनों में भटकता रहा। पहाड़ियों की गुफ़ाओं में ध्यान, तप और अध्ययन करते हुए समय व्यतीत किया। कुछ समय आलार कालाम सन्यासी के पास रहे। उसके बाद उद्रक नामक सन्यासी से हिन्दू धर्म दर्शन की शिक्षा प्राप्त की। उद्रक ने सांख्य दर्शन के अनुसार शिक्षा प्रदान की थी। लेकिन इससे सिद्धार्थ को मानसिक शान्ति नहीं मिली हृदय को सन्तोष न मिला।
यहाँ आसमान में कड़क बिजलियाँ चमक रही है। बादलों की गड़गड़ाहट में किसी की आवाज सुनाई नहीं देती। बरसात की बूंदें बड़े ओलों के रूप में गिर रही हैं।
खेतों में गेहूँ कटा पड़ा है। चना मुस्तैदी से खड़ा है। सेम से लेकर बाकी सब्जियाँ झूम रही हैं। लेकिन काले बादल देखकर किसान की आँखें रो रही हैं। वह खेत मे बिजूका बनकर रह गया है, बस।
ये राजस्थान के एक गाँव का दृश्य है। सवेरा अभी हुआ नहीं है। बस होने को है। यह सूर्योदय से ठीक पहले की वेला है। मई का महीना है। लेकिन ‘ताऊ ते’ तूफ़ान का कुछ असर है। इससे बेख़बर कि इसने हज़ारों घर तबाह किए हैं और सैकड़ों जानें भी ली हैं। यहाँ दो दिन से लगातार बारिश हो रही है। इसलिए मई की बीती तारीख प्रदेश में 10 साल की सबसे कम गर्म रही। ये और बात है कि प्रदेश में अग्रणी और देश का नम्बर-एक अख़बार होने का दावा करने वाला समाचार पत्र मई को सबसे ठंडी कह देता है। अख़बार के पहले पन्ने पर मोटे-मोटे अक्षरों में लिखी यह बात पढ़कर मैं अपनी हँसी नहीं रोक पाती हूँ।