अभी इसी महीने की 14 तारीख को 'हिन्दी दिवस’ मनाया गया। हर साल मनाया जाता है। लेकिन हर बार हिन्दी के प्रसार के लिए होने वाले सार्थक प्रयासों की जगह भाषायी विवाद ज्यादा सुर्खियाँ बटोरते हैं। इस बार भी यही हुआ। कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी का बयान 'हिन्दी दिवस’ के मौके पर पूरे दिन चर्चा में रहा। उन्होंने कहा था, “हिन्दी कोई राष्ट्रभाषा नहीं है। हो भी नहीं सकती।” दक्षिण भारत के किसी राजनेता द्वारा हिन्दी पर की गई ऐसी टिप्पणी कोई नई बात नहीं है। वहाँ दशकों से हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने-बताने की हर कोशिश का विरोध होता आया है। पर दुखद य
मैंने 17 अगस्त 2020 को फ्लिपकार्ट से एक मोबाइल फ़ोन मँगवाया। सामान बताए गए पते पर पहुँचने के बाद भुगतान करने (कैश ऑन डिलीवरी) का वहाँ कोई विकल्प नहीं था। इसलिए एकीकृत भुगतान व्यवस्था- यूपीआई (Unified Payments Interface) के ज़रिए भुगतान किया। बाद में किसी वजह से 20 अगस्त को मैंने मोबाइल का वह ऑर्डर रद्द कर दिया। उस समय फ्लिपकार्ट की ओर से बताया गया, “आपके पैसे वापस कर दिए गए हैं।” मैंने पता लगाया तो मेरे खाते में पैसे नहीं पहुँचे थे। तब मैंने सोचा कि अमूमन ऐसा होता है। कुछ दिन इन्तज़ार करना चाहिए।
मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के बाहरी इलाके में स्थापित ध्रुपद संस्थान पिछले 15-20 दिनों से चर्चाओं में बना हुआ है। वैसे देश और दुनिया में यह संस्थान चर्चित तो पहले से भी रहा है। लेकिन पहले और अब में फर्क है। पहले यह सकारात्मक संगीतिक कारणों चर्चा में रहता था और अभी नकारात्मक व्यक्तिगत कारणों से है। बल्कि मौज़ूदा कारणों को व्यक्तिगत कहना भी ठीक नहीं होगा। वे व्यक्तिगत तो तब तक थे, जब तक संस्थान के गलियारों की कानाफूसी में समाए हुए थे। लेकिन अब तो सार्वजनिक मंचों पर सबके सामने हैं। बहस का केन्द्र बने हुए हैं और उसके जरिए हमें बता रहे हैं कि ध्रुपद संस्थान में जो रहा है, उसके लिए कहीं न कहीं ह
नैनीताल में जुलाई से सितम्बर तक लगभग ढाई-तीन महीनों की लगातार बरसात और सीलन के बाद धूप आने पर गर्म कपड़ों, गलीचों, गद्दे और रजाइयों को टीन की छत पर सुखाने का एक सिलसिला चलता है। महीनों की सीलन और उदासी के बाद चमकदार धूप आने पर उसमें सूखते कपड़ों और हवा में गायब होती गर्म सीलन को सूँघने की ख़ुशी टीन की नालीदार छतों पर संभल-संभलकर चलती उन मुदितमना गृहणियों के चेहरे पर साफ़ झलकती है। घर के पुरुषों का भी इस जरूरी काम में भरपूर योगदान होता है। कारण कि अमूमन पहाड़ी घरों में पाए जाने वाले और बरसात के मौसम में लीटरों पानी और सीलन पी चुके गाँधी आश्रम के उन 50-50 किलो रुई के गद्दे, रजा
प्रिय ईशू
तुम कुछ ही दिनों बाद इस समय जिनेवा में सम्भवत: अपनी कक्षा में रहोगे। यह भगवद्कृपा है कि उच्च शिक्षा के लिए तुम्हें एक अच्छे विश्वविद्यालय में अध्ययन का अवसर मिला है। तुम अपनी पढ़ाई अच्छे से करोगे, इसमें मुझे सन्देह नहीं। पर मैं तुम्हारा ध्यान एक दीगर बात की ओर आकर्षित करना चाहूँगा। वह है, अध्ययन के अतिरिक्त ज्ञानार्जन की। अपने प्रवास के दौरान तुम यूरोप में भारत के प्रतिनिधि रहोगे। स्थानीय नागरिक तुम्हारे हर व्यवहार और गतिविधि से भारतीयों के सम्बन्ध में राय बनाएँगे। इसलिए एक जिज्ञासु विद्यार्थी के रूप में तुम्हारे ऊपर बड़ी जिम्मेदारी होगी।
आज अनन्त चतुर्दशी मनाई गई। भगवान विष्णु के अनन्त स्वरूप की इस दिन विशेष पूजा की जाती है। इसलिए उन्हीं से जुड़े अपने अनुभव के एक प्रसंग को आज मैं ‘डायरी’ में दर्ज़ करना चाहूँगा। कुछ रोज पहले मेरे एक परिचित ने मुझे व्हाट्स ऐप पर एक वीडियो भेजा। तिरुपति के मन्दिर में भगवान वेंकटेश्वर की आरती का वीडियो था। उसे देखकर मेरे सामने कई साल पहले की यादें ताज़ा हो गईं, जब मैं तिरुपति गया था। भगवान वेंकटेश्वर के दर्शन के लिए। इस समय जो वीडियो मेरे सामने था, वह महज 1:02 मिनट का था। लेकिन उसे देखने के बाद बहुत देर तक उस मन्दिर के तमाम दृश्य मेरी आँखों के सामने घूमते रहे। एक बार तो ऐसा लग
हिन्दी फिल्मों के अभिनेता आमिर खान और उर्दू शायर मुनव्वर राणा इन दिनों विवादों में बने हुए हैं। अभी तीन-चार दिन पहले ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के मुखपत्र ‘पाँचजन्य’ में एक लेख प्रकाशित हुआ है। इसका शीर्षक था, ‘ड्रैगन का प्यारा खान’। इसमें सवाल उठाया गया है कि चीन में आमिर खान की फ़िल्में क्यों शानदार कारोबार करती हैं?
आज यकायक माई की याद आ गई। इसीलिए उसकी स्मृति को डायरी में दर्ज कर रही हूँ। यही कोई 38 साल पहले की बात है। तब मैं बहुत छोटी थी। पाँच-छह साल की। स्कूल में नया दाखिला मिला था। बाबा के तबादले के साथ ही हम एक नए शहर में आए थे। बुलढाणा, जो महाराष्ट्र के पहाड़ों में बसा है। हमारा बड़ा कुनबा था। दादा, दादी, दो चाचा, हम तीन बच्चे। बाबा घर भी बनवा रहे थे। सो, माँ पर काम का बोझ बहुत बढ़ गया था। तब वह बूढ़ी माई हमारे घर पहली बार आई थी। घरेलू कामकाज के लिए। कमर कुछ झुकी हुई। बाल काले, घुँघराले। उनका छोटा सा जूड़ा बना होता था। वह भील जाति से थी।
करीब दस साल पहले एक चैनल से विदा होते हुए जब मैं अपने साथियों से अन्तिम बार मिल रहा था, तब एक कमउम्र लड़की ने मुझसे बाय कहा। मैंने जवाब दिया, “देखो.. जल्दी भेंट होगी!” वह कुछ विस्मय से बोली, “सर आप हिन्दी के बड़े अच्छे और भूले-बिसरे शब्द बोलते हैं।”
ख़बर आई है कि पंडित जसराज नहीं रहे। पर क्या ऐसा हो सकता है भला? ये सवाल ग़ैरवाज़िब नहीं, बल्कि सोचने लायक है। क्योंकि जो शख़्स अपने संगीत से पिता को भी जीवन्त करने का इरादा रखता हो। जिसने अपने संगीत से पिता के साथ-साथ ख़ुद को भी समयातीत-सा बना लिया हो। क्या वह यूँ दुनिया छोड़ सकता है? नहीं। हाँ, उनकी ‘देह का अन्त’ ज़रूर हुआ है अलबत्ता और ये सच्चाई है। लेकिन बस इतनी ही। पंडित जसराज ख़ुद भी देह-गेह की बस इतनी ही सच्चाई स्वीकार करते थे शायद। उनके जीवन से जुड़े किस्सों से ये बात साबित होती है।