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परलोक और पुनर्जन्म को विज्ञान माने या न माने, ज्ञान साक्षात् दिखा देता है

समीर, भोपाल, मध्य प्रदेश से, 11/12/2020

परलोक और पुनर्जन्म- दो ऐसी बातें हैं, जिनके बिना धर्म की गहनता को समझना सम्भव नहीं है। विज्ञान या तर्क से इसे न तो साबित कर सकते हैं और न ही ख़ारिज़। विज्ञान हालाँकि मानता है कि पदार्थ और ऊर्जा न पैदा होते हैं, न नष्ट। उनका बस रूपान्तरण होता रहता है। वह ये भी मानता है कि विचार, मनोभाव, विश्वास आदि के साथ मानव शरीर ऊर्जा की प्रक्रिया मात्र है। मानव ऊर्जा क्षेत्र के प्रयोगों में यह देखा जा सकता है।

तस्वीर (साभार)

आरबीआई के 10 लाख फॉलोअर्स होना ख़बर तो है, पर सबको ये ख़बर क्यों नहीं है?

विकास, दिल्ली से, 28/11/2020

अभी तीन रोज पहले सवेरे से ही फेसबुक के ज़रिए मिली एक ख़बर ने बड़ा बेचैन कर रखा था। आजकल ख़बरें अख़बार से बाद में, फेसबुक और ट्विटर से पहले मिलती हैं। अख़बार तो वैसे भी कोरोना-काल में अपन ने बन्द ही कर रखा है। इसलिए ई-पेपर पढ़ने के लिए मोबाइल सबसे सुविधाजनक बन पड़ता है। जहाँ मर्जी ले जाओ। चाहे तो शौचालय में भी। 

प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार)

हम खुद मजबूत होंगे, तब ही किसी की मदद कर सकेंगे

शिखा पांडे, अहमदाबाद, गुजरात से, 22/11/2020

अल-सुबह सबसे पहले उठना। देर रात सबसे बाद में सोना। परिवार के एक-एक सदस्य की छोटी से बड़ी, हर चीज का ख्याल रखना। घर के भीतर कब, क्या और कैसे होना है, उस सबका सोचना। उसे करना और कराना। ये पहचान है भारतीय गृहिणी की।

डॉक्टर प्रमोद पांडेय (तस्वीर साभार)

‘ग्रामोदय से भारत उदय’ की अवधारणा नानाजी देशमुख की थी, हम उसी से फूटे अंकुर हैं!

डॉक्टर प्रमोद पांडे, कैलीफोर्निया, अमेरिका से, 30/10/2020

मैं प्रमोद पांडे। वर्तमान में अमेरिका के कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय में व्याख्याता (Professor) हूँ। हालाँकि मैं मूल रूप से मध्य प्रदेश के सतना जिले के चित्रकूट से ताल्लुक रखता हूँ। वहाँ के नज़दीकी गाँव नकैला में मेरा जन्म हुआ। शुरुआती शिक्षा भी गाँव के सरकारी विद्यालय में ही हुई। इसके बाद मैं उच्च शिक्षा के लिए चित्रकूट आ गया। वहाँ ग्रामोदय विश्वविद्यालय से मैंने अभियांत्रिकी में स्नातक (Bachelor in Engineering) की उपाधि ली। वहाँ की पढ़ाई मेरे जीवन का सबसे अहम मोड़ साबित हुई। यह मानने में मुझे कोई संकोच नहीं है। 

भारत रत्न नानाजी देशमुख के सहयोगी रहे गोपाल भाई (तस्वीर साभार)

इस वीडियो से वह वज़ह जानते हैं कि नानाजी देशमुख शरदोत्सव के लिए तैयार क्यों हुए?

गोपाल भाई, चित्रकूट, उत्तर प्रदेश से, 30/10/2020

नानाजी देशमुख ने अगर अपने सहयोगी डॉक्टर भरत पाठक जी को शरदोत्सव के तौर पर अपनी जयन्ती मनाने की सहमति दी तो वह यूँ ही नहीं थी। उसके पीछे उनका ख़ास मक़सद था। मन्तव्य था और इसकी भूमिका भी उनके मन-मस्तिष्क में काफी पहले बन चुकी थी। मुझे याद है, जब नानाजी ने बुन्देलखंड को अपना कार्यस्थल बनाया तो उनके मन में इस क्षेत्र के बारे में जानने की बड़ी उत्सुकता थी। यहाँ की संस्कृति, यहाँ का साहित्य, संगीत, आदि हर चीज में वे रुचि दिखा रहे थे। यह बात 1990 के दशक की शुरुआत की है। तब चित्रकूट में ग्रामोदय विश्वविद्यालय की स्थापना की नींव तैयार हो रही थी। उसी दौरान 18,19,20 नवम्बर 1991 को चित्रक

अनहद-2020 की आयोजन समिति के सदस्य (तस्वीर साभार)

नानाजी देशमुख शरदोत्सव के रूप में अपना जन्मदिन मनाने को तैयार कैसे हुए?

नन्दिता पाठक, दिल्ली से, 28/10/2020

महाराष्ट्र के कडोली गाँव (हिंगोली जिला) में 11 अक्टूबर 1916 को जब नानाजी देशमुख का जन्म हुआ, उस दिन शरद पूर्णिमा थी। कहा जाता है, शरद पूर्णिमा को चन्द्रमा अपनी सोलह कलाओं से विभूषित होता है। पूर्णता को प्राप्त होता है और अपने इस रूप में वह पूरी सृष्टि में अमृत बाँटता है। यह निश्चित रूप से इस तिथि का ही संयोग था कि नानाजी देशमुख का व्यक्तित्तव भी समय के साथ विविध कलाओं (गुणों) से विभूषित हुआ। समय के साथ-साथ पूर्णिमा के चाँद की तरह पूर्णता को प्राप्त होता गया और फिर पूरे समाज को उन्होंने सेवा का अमृत बाँटा। 

‘कुमारी’ अबु बाकेर, एक कार्यक्रम के दौरान।

क्यों हमें ‘कुमारी’ अबू बाकेर और इस्लामिक कीर्तन परम्परा के बारे में जानना चाहिए?

नीलेश द्विवेदी, भोपाल, मध्य प्रदेश से, 18/10/2020

अभी कुछ रोज पहले तक कर्नाटक (दक्षिण भारतीय) संगीत के एक बड़े गायक हुआ करते थे। नाम था, ‘कुमारी’ अबुबाकेर। जैसा नाम दिलचस्प, वैसा ही काम भी। वे ‘तमिल इस्लामिक कीर्तन’ परम्परा के आख़िरी स्तम्भ थे। ‘कुमारी’ अबुबाकेर के निधन के साथ वह स्तम्भ इसी महीने ढह गया। दुख की ही बात है कि भारतीय सांगीतिक संस्कृति के ऐसे बिरले नाम और परम्परा के धारक तथा साधक को न जीवनकाल में उनके हिस्से का सम्मान मिला, न निधन के बाद। आलम ये कि दक्खन के दो प्रमुख अख़बारों की वेबसाइट

भारत रत्न नानाजी देशमुख

नानाजी देशमुख, जिनका ‘ग्राम-स्वराज’ आज के ‘आत्मनिर्भर भारत’ की राह दिखाता है

डॉक्टर नन्दिता पाठक, दिल्ली से, 11/10/2020

भारत में छह लाख से अधिक गाँव हैं। देश की अधिकांश जनसंख्या इन्हीं गाँवों में रहती है। हालाँकि वर्तमान दौर में गाँवों की बड़ी आबादी रोजगार के लिए शहरों की ओर पलायन कर रही है। इससे शहरों पर आबादी का बोझ बढ़ रहा है। इसका असर या कहें कि विपरीत प्रभाव हमारे देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। अभी जब कोरोना महामारी का संक्रमण रोकने के मकसद से पूरे देश में तालाबन्दी हुई, तब हम सबको इन विपरीत प्रभावों की भयावहता का कुछ अंदाज़ भी हुआ। हमने लाखों ग्रामवासियों को पाँव-पाँव, पीड़ा भोगते हुए, शहरों से अपने गाँवों, घरों की तरफ़ लौटते देखा। इस सफर में हजारों लोग रेल की पटर

प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार)

आज का दिन वायरस यानि विषाणुओं की तारीफ़ का, जानते हैं क्यों?

नीलेश द्विवेदी, भोपाल मध्य प्रदेश से, 3/10/2020

विषाणु (Virus) हमारे जीवन में सिर्फ़ विष यानि नकारात्मकता नहीं लाते। वे हमें काफी कुछ सकारात्मक भी देते हैं। बल्कि कुछ विषाणु तो अच्छे ही माने जाते हैं। मतलब कि वे हमारी सेहत, शरीर के लिए फायदेमन्द (Good Virus) होते हैं। वहीं जो ख़तरनाक होते हैं, घातक और मारक होते हैं, जैसे कि कोरोना, उनका भी दूसरा पहलू सकारात्मकता से भरपूर है। ऐसे विषाणु भी हमारे लिए कई अच्छे बदलावों के माध्यम बनते हैं। 

लता मंगेशकर

हेमा से लता और फिर ‘भारत रत्न’ लता मंगेशकर: ये संघर्ष, साधना, सादगी के सफर का नाम है!

नीलेश द्विवेदी, भोपाल, मध्य प्रदेश से, 28/9/2020

लता मंगेशकर की ज़िन्दगी का शायद ही कोई पहलू ऐसा होगा, जिसे छुआ न गया हो। जिसके बारे में लिखा या पढ़ा न गया हो। फिर भी आज जब वे जीवन के 92वें पड़ाव पर पहुँची हैं, तो उनकी उम्र के बीते 91 साल के सफर के कुछ अहम मुकामों पर फिर नजर डाली जा सकती है। क्योंकि यह कोई सामान्य सफर नहीं है। हेमा से लता और फिर ‘भारत रत्न’ लता मंगेशकर, संघर्ष, साधना और सादगी के सफर का नाम है। जिससे हम कभी भी, कितनी बार भी रू-ब-रू हों, हमें प्रेरणा ही मिलती है। ये बताता है कि ‘भारत रत्न’ कोई यूँ ही नहीं हो जाता।

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