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प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार)

काश, चाँद की आभा भी नीली होती, सितारे भी और अंधेरा भी नीला हो जाता!

संदीप नाईक, देवास, मध्य प्रदेश से, 24/3/2021

इसी गाढ़ी नीली दीवार के पीछे लटका है, माघ के शुक्ल पक्ष का चाँद, जो पूनम से होते हुए आज चौथ पर एक चौथाई कम हो गया है।  बस यही, हाँ यही चाँद मुझे पसन्द है - पूनम का बड़ा सा खिला-खिला दूधिया रोशनी में नहाता चाँद मुझे पसन्द नही है, जिसे सारी दुनिया देखती है। आज के चाँद को देखने वही लोग देर तक जागते हैं, जो उपवास करते है, हिम्मत से भूखे रहकर बाट जोहते रहते हैं कि कब आसमान में चौथ का उदय होगा और चाँद निकलेगा।

‘चारु-वाक्’...औरन को शीतल करे, आपहुँ शीतल होए!

अनुज राज पाठक, दिल्ली से, 23/3/2021

बुद्ध दर्शन। ये परवर्ती दर्शन है। लेकिन बुद्ध दर्शन परम्परा का आदि दर्शन है, ‘चार्वाक दर्शन’। सवाल हो सकता है कि यह बौद्ध परम्परा का आदि दर्शन कैसे? तो ज़वाब ये मिलता है कि बौद्ध दर्शन असल में नास्तिक दर्शन है। और भारतीय दर्शन परम्परा में आचार्य चार्वाक को नास्तिकों का शिरोमणि कहा जाए तो सम्भवत: अनुचित न होगा। इस तरह नास्तिक दर्शनों में आदि दर्शन हुआ, चार्वाक दर्शन। इसीलिए यह बुद्ध दर्शन का भी आदि दर्शन हुआ। 

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मैं 70-80 के दशक का बचपन हूँ...

अवनीश सक्सेना, भोपाल, मध्य प्रदेश से, 19/3/2021

ये लाइनें किसने लिखीं, पता नहीं। लेकिन जिसने भी लिखीं, क्या खूब और कितनी सच्ची लिखी हैं। दिल से लिखी हैं। सीधे दिल तक पहुँचती हैं। बीते दिनों सामाजिक कहे जाने वाले माध्यमों (Social Media) से होते हुए मुझ तक ये लाइनें पहुँचीं, तो मुझे लगा इसे #अपनीडिजिटलडायरी पर भी दर्ज़ करना चाहिए। इसीलिए लिखने वाले के प्रति ह्रदय से आभार व्यक्त करते हुए इन लाइनों का यहाँ उल्लेख कर रहा हूँ, जिन्होंने चन्द मिनटों में ही मेरा और मेरे जैसे न जाने कितने लोगों का बचपन आँखों में तैरा दिया होगा।

मैं 70-80 के दशक का बचपन हूँ।

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जब कोई विमान अपने ताकतवर पंखों से चीरता हुआ इसके भीतर पहुँच जाता है तो...

संदीप नाईक, देवास, मध्य प्रदेश से, 17/3/2021

हम सब अपने एकांत में बेहद क्रूर और दुराचारी होते हैं। भीड़ में बेहद डरपोक और शिष्ट।

याद आता है कि कैसे एक शान्त नदी अपने उद्भव से निकलती है, तो छोटी सी लकीर होती है। पर ज्यों-ज्यों पहाड़, कन्दराओं से गुजरती है तो उच्छृंखल और बेख़ौफ़ होती जाती है। क्योंकि वह अपने उद्भव को, अपनी जड़ों को छोड़ चुकी है। अब मस्त होकर वह सब कुछ हासिल कर लेना चाहती है। 

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परम् ब्रह्म को जानने, प्राप्त करने का क्रम कैसे शुरू हुआ होगा?

अनुज राज पाठक, दिल्ली से, 16/3/2021

क्या है कि बहुत से मनुष्यों की प्रकृति बेचैन रहने की होती है। उनको कुछ ना कुछ चाहिए, जिसमें वे उलझे रहें। ऐसे ही कुछ लोगों के मन में हर चीज को खोद-खोद कर देखने की आदत लगी होगी। उनकी बेचैन प्रकृति ने उनके मन में उतने ही स्वाभाविक सवाल पैदा किए होंगे। जैसे, हवा क्या है? पानी क्या है? ज़मीन क्या है? आग क्या है? आकाश क्या है? ये कहाँ से आए? इन्हें किसने बनाया? क्यों बनाया? इनकी जरूरत क्या है? इन्हें मिटा कौन देता है? ऐसे तमाम सवालों से उन पहले से बेचैन लोगों की बेचैनी और बढ़ी होगी।  

सही है, भारतीय संस्कृति तभी विकसित हो सकी, जब जीवन व्यवस्थित था!

डॉ रवि प्रभात, रोहतक, हरियाणा से, 12/3/2021

#अपनीडिजिटलडायरी पर भारतीय दर्शन श्रृंखला का पहला लेख पढ़ा। शुरुआत बहुत अच्छी है।

मेरी भी यही मान्यता है कि भारतीय संस्कृति अपने उदातग स्वरूप में, समृद्ध चिन्तन परम्परा में, ज्ञान विज्ञान की उन्नति में, वाद-प्रतिवाद, तर्क-वितर्क, इन सब में तभी विकसित हो पाई, जब हम भौतिक ऐश्वर्य से युक्त हो चुके थे। जीवन व्यवस्थित था। कोई न कोई शासन, न्याय प्रणाली आकार ले चुकी थी। कभी भी भूखा, कबीलाई, घुमक्कड़ समाज इतना उत्कृष्ट चिन्तन नहीं दे सकता।

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किसी ने पूछा कि पेड़ का रंग कैसा हो, तो मैंने बहुत सोचकर देर से ज़वाब दिया - नीला!

संदीप नाईक, देवास, मध्य प्रदेश से, 10/3/2021

एक दीवार है, जो गाढ़ी नीली रँगी है। जब कमरा बना था, तो इस पिछली दीवार को गाढ़ा नीला रंग लगाया था। ठीक पिछले पड़ोसी की दीवार से लगकर इसे कंक्रीट की छत पर उठाया था, जो अब इस कमरे की ज़मीन बन गई है।

तीन हल्के नीले रंगों के बीच गाढ़े रँगीले नीले रंग पर एक छोटा सा बल्ब भी टाँग रखा है। वो भी गहरा नीला है। सिर्फ़ उजाले से ही नही, बल्कि अपने होने से भी। 

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क्यों आज हमें एक समतामूलक समाज की बड़ी ज़रूरत है?

आद्या दीक्षित, ग्वालियर, मध्य प्रदेश से, 8/3/2021

जिस विषय में बहुत लिखा गया हो, उसके बारे में लिखना कठिन होता है। जिस सम्बन्ध में सबको खूब ज्ञान हो, उस बारे कुछ समझाना बेहद कठिन होता है। और अगर ‘गंगाराम’ तोते ने ये रट लिया हो कि ‘नल के नीचे नहीं नहाना’, तो उसे कुछ और बताना लगभग नामुमकिन हो जाता है। महिलाओं के मामले में हमारे समाज की यही स्थिति है। इतना ज्ञान, इतनी बातें, इतने आदर्श, इतने नैतिक नियम, लुभावने उदाहरण और इतना कुछ लिखा, पढ़ा, सुना हुआ है कि हमें तोते की तरह रट गया है, सब। अब उससे इतर कुछ देखने में हमें मुश्किल होने लगी है । सच कहूँ, तो अब मेरा मन भी नहीं होता कुछ कहने, लिखने का। 
 

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महिला जब इरादा ठान लेती है, तो सबको उसके साथ कदमताल करनी पड़ती है!

डॉक्टर नन्दिता पाठक, दिल्ली से, 8/3/2021

महान् गुणों से ओत-प्रोत महिलाएँ समर्थ थीं, हैं और रहेंगी भी। क्योंकि उनमें तमाम विपरीतताओं के बावज़ूद उस सामर्थ्य को हासिल कर लेने का इरादा होता है। कैसे भी। उदाहरण, अभी कुछ दिन पहले ही मेरे अनुभव से गुज़रा। मेरी सासू माँ श्रीमती शकुन्तला पाठक जी का उस दिन मेरे पास फोन आया। वे पूछ रही थीं, “बेटा गाड़ी में ऐसी कौन सी चीज लगती है, जिससे कहीं आते-जाते वक़्त बीच रास्ते में कहीं रुकना नहीं पड़ता।” उनकी बात सुनकर समझने में मुझे थोड़ा समय लगा। इस बीच उन्होंने जैसे ही बताया कि रास्ते में “सबकी गाड़ियाँ बिना रुके निकल जाती हैं, पर हमारी रुकी रहती है”, तो बात तुरन्त मेरी समझ में आ गई।&nb

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गुलामी का सुख...‘पाश’ से बँधा, सो पशु!

नीलेश द्विवेदी, भोपाल, मध्य प्रदेश से, 7/3/2021

अख़बारी दफ़्तर में शनिवार-इतवार को अमूमन काम कुछ कम ही हुआ करता है। विशेष तौर पर अगर कोई घटना-दुर्घटना न हो ताे। लिहाज़ा, इसी शनीचर की रात फ़ुर्सत के पलों में बैठे-ठाले मैं कुछ कड़ियाँ जोड़ने की कोशिश कर रहा था। ये कड़ियाँ बीते दो-तीन महीनों में मेरी नज़रों के सामने से गुजरी थीं। सो, अपने ज़ेहन की तस्वीरों को थोड़ा उल्टा घुमाया तो पाया कि कड़ियाँ आपस में पहले ही जुड़ी हैं। बस, नज़र नहीं गई थी। एक शीशेनुमा महीन धागे ने उन्हें आपस में जोड़ रखा था। उस पर अब जबकि मेरी नज़र ठहरी तो ख़ुद का अक़्स दिखने लगा। सुन्दर क़तई नहीं था वह। इसलिए एकबारगी लगा कि इस कहानी को यूँ ही  बिना ना

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