रोचक-सोचक

प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार)

झुकन झुकन से जानिए, झुकन झुकन पहचान!

टीम डायरी, 3/3/2020

बड़े बुज़ुर्ग पहले जो बातें कहावतों में कह जाया करते थे, उनकी मार दूर तक होती थी। सटीक निशाने पर लगती थी। शायद इसीलिए किसी ने दो पंक्तियों में लिखा है, ‘पुराने लोग अच्छे थे, बाण मारते थे’। ये एक तरह का रूपक है। इस ‘बाण’ में वे तीर तो हैं ही, जो कमान से छूटते थे। वे तीखी कवाहतें भी हैं, जो ज़ुबान से निकलती थीं। हालाँकि वक्त के साथ हमने बुज़ुर्गों को वृद्धाश्रम भेज दिया और उनकी कही बातों को ‘मार्गदर्शक मंडल’ में। यानि वे जगहें, जो होने के बावज़ूद हमारे लिए न होने जैसी हैं। और जिनकी तरफ़ हम बेपरवाह हो चुके हैं। 

सुकून वहाँ नहीं जहाँ हम ढूँढ़ते हैं

रैना द्विवेदी, भोपाल, मध्य प्रदेश से, 25/2/2021

जीवन की आपाधापी। तरक्की के ऊँचे पायदान। खूब पैसा। तमाम सुविधाएँ। लेकिन क्या इन सब को पाकर हम खुश हैं? संतुष्ट हैं? हमारा मन शान्त है?

इन सवालों के ज़वाब अधिकांश लोगों के पास ‘नहीं’ में ही हो सकते हैं। इसीलिए यहाँ फिर सवाल हो सकता है कि आख़िरकार ऐसा क्यों है कि जिन चीजों के पीछे हम भाग रहे हैं। जिन्हें हम कुछ हद तक हासिल भी कर रहे हैं। उन्हें पाकर, उनके लिए कोशिश कर के भी हमें आनन्द क्यों नहीं मिलता? 

तस्वीर (साभार)

13 फरवरी 2021 : तारीख, कंकर के शंकर हो जाने की!

नीलेश द्विवेदी,भोपाल, मध्य प्रदेश से, 13/2/2021

हर पहलू से रोचक-सोचक है, ये दास्तां। दास्तां, एक मजदूर की। दास्तां, उस मजदूर के सबसे सम्मानित शख़्सियतों में शुमार होने की। दास्तां, कंकर के शंकर हो जाने की। दास्तां, भूरी बाई की। 

प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार)

जहाँ सिंह, वही सिंहासन

टीम डायरी, 22/1/2021

अभी हाल में एक तस्वीर सामाजिक मंचों (सोशल मीडिया) पर तेजी से प्रसारित हुई। इसमें एक सिंह सामान्य घरेलू सोफे पर बैठा दिखाई दिया। तस्वीर कहाँ की थी, असल थी या गढ़ी हुई, यहाँ ये बहुत मायने नहीं रखता। मायने रखता है, इस तस्वीर के पीछे छिपा सन्देश, जो हमारे काम का हो सकता है। इसीलिए यह सामान्य और सहज हँसी-मज़ाक जैसा दिखने वाला विषय भी #अपनीडिजिटलडायरी के इस लेख का कारण है।

प्रतीकात्मक तस्वीर

हमारी सोच और ईश्वर का न्याय

रैना द्विवेदी, भोपाल, मध्य प्रदेश से, 30/12/2020

अक्सर हम ईश्वर के न्याय पर सवाल उठाते हैं। हमारी यह मनोदशा खास तौर पर उस समय होती है, जब हमें लगता है कि हमारे साथ अन्याय हुआ है। ऐसे मौकों पर हम हमेशा सोचते हैं कि हमने तो कभी किसी के साथ गलत किया नहीं। फिर हमें ही ईश्वर ने तकलीफ़ क्यों दी? हमें औरों से कम क्यों दिया? वहीं दूसरी तरफ जिन लोगों काे हम हमेशा गलत करते देखते हैं, उन्हें सुख भोगते हुए पाते हैं। तब फिर हमारे मन में सवाल उठते हैं कि ईश्वर उन्हें पीड़ित-प्रताड़ित क्यों नहीं करते?

केल्हौरा की कहानी बताती है कि गाँव के भीतर से ही जल, जंगल, ज़मीन की सूरत बदल सकती है!

टीम डायरी, 12/12/2020

ये एक छोटे से गाँव की बड़ी कहानी है। देखी जा सकती है, सुनी जा सकती है और गुनी भी। यानि इस पर विचार किया जा सकता है। इससे सीखा जा सकता है। इसकी मिसाल पर अमल किया जा सकता है। 
 

प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार)

क्या यह वाकई सरकार की ओर से कोरोना योद्धाओं का सम्मान है?

टीम डायरी, 20/11/2020

केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार ने अभी गुरुवार, 19 नवम्बर को एक अहम घोषणा की है। इसके मुताबिक देशभर के चिकित्सा महाविद्यालयों (Medical Colleges) में कोरोना योद्धाओं के बच्चों के दाखिले के लिए एमबीबीएस और बीडीएस पाठ्यक्रमों में कुछ सीटें आरक्षित रखी जाएँगीं। केन्द्र सरकार के काेटे (Central Pool) से ये सीटें दी जाएँगी। केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर हर्षवर्धन ने यह घोषणा की। साथ ही जोड़ा कि सरकार का “यह फैसला उन कोरोना योद्धाओं के सम्मान में एक छोटा सा प्रयास है, जिन्होंने मानवता के लिए जीवन बलिदान कर दिया।”

तस्वीर (साभार, द मिस्टिक बैम्बू अकादमी)

विजयादशमी पर ‘शक्ति का नाद, शक्ति द्वारा, शक्ति के लिए’!

टीम डायरी, 26/10/2020

विजयादशमी, यानि विजय के उद्घोष का दिन। ये उद्घोष अगर ‘शक्ति का, शक्ति द्वारा और शक्ति के लिए’ हो तो? प्रश्न जितना ‘रोचक’ (Interesting) है, उतना ही ‘सोचक’ (Thinkable) भी। और इसका उत्तर ‘द मिस्टिक बैम्बू अकादमी’ के इस वीडियो में है।

इस वीडियो में ‘राग दुर्गा’ सुनाई दे रहा है। दुर्गा यानि शक्ति, जिसकी पूरे देश ने अभी नौ दिनों तक साधना, आराधना की। इस तरह ये ‘शक्ति का नाद’ हुआ।

इसमें सभी वादक-कलाकार महिलाएँ हैं। महिला यानि शक्ति का जीवन्त प्रतीक। लिहाज़ा इस अर्थ में ‘शक्ति का नाद, शक्ति द्वारा’ बन गया।

अनन्या पाठक

परिवेश कैसे बच्चों में संस्कार डालता है, इस वीडियो से समझ सकते हैं

अनन्या पाठक, दिल्ली से, 12/10/2020

बच्चों में पड़ने वाले हर संस्कारों में, वे अच्छे हों या बुरे, परिवेश की भूमिका अहम होती है। ये इस वीडियो को देखकर समझा जा सकता है। इसमें अनन्या पाठक हैं। उम्र सिर्फ 11 साल। लेकिन इतनी उम्र इन्होंने जिस परिवेश में गुजारी, उसने इन्हें शुरुआती तौर पर गढ़ने में अहम भूमिका निभाई है। इसका प्रमाण है, ये गीत जो वे गा रही हैं। अभी 11 अक्टूबर को भारत रत्न नानाजी देशमुख की जयन्ती पर इन्होंने उन्हीं के एक गीत से उनका स्मरण किया। गीत के बोल हैं, “हर हाथ को देंगे काम, हर खेत को देंगे पानी। दुलहन बनकर फिर से सजेगी अपनी धरती रानी।।”

प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार)

क्या डोनाल्ड ट्रम्प कोरोना पर ‘चुनावी जोख़िम’ ले रहे हैं?

टीम डायरी, 6/10/2020

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के बारे में सूचना है कि वे सोमवार को (अमेरिकी समयानुसार) कोरोना संक्रमण के बावज़ूद अपने आधिकारिक निवास ‘व्हाइट हाउस’ (White House) लौट आए हैं। इससे पहले वे चार दिन तक सेना के अस्पताल (Walter Read National Medical Center) में भर्ती रहे। लेकिन चिकित्सकों ने उनके कहने पर ही उन्हें वहाँ से छुट्‌टी दे दी। 

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