ये तस्वीर अपने आप में बहुत कुछ कहती है। वाराणसी की है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का संसदीय क्षेत्र। शहनाई का दूसरा नाम कहे जाने वाले उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ जैसे भारत-रत्नों की कर्मभूमि। जन्मभूमि। संगीत, कला, साहित्य, संस्कृति का धाम। बाबा विश्वनाथ की काशी।
ऐसे और न जाने कितने तमगे हैं इस शहर कन्धों पर। इसीलिए कम से कम इस शहर से तो ऐसी तस्वीर की अपेक्षा नहीं ही की जानी चाहिए। लेकिन यह स्याह हक़ीक़त है। हर बारिश में उधड़कर ऐसे ही सामने आ जाया करती है।
आज संत कबीरदास जी की जयन्ती है। ज्येष्ठ शुक्ल पूर्णिमा तिथि। सन् 1398 में कबीरदास जी का जन्म हुआ, ऐसा बताया जाता है। मतलब आज से लगभग 623 बरस पहले। लेकिन इतना समय बीत जाने के बाद कबीर आज भी प्रासंगिक हैं। दो-दो, चार-चार लाइनों के छन्द और दोहों में वे सब जो कह गए हैं। जीवन के निचोड़ बता गए हैं। कोरोना के इस कालखंड में (वीडियो में कही जा रही) उनकी इस रचना को ही लें। हर शब्द, हर लाइन हथौड़े की तरह हम पार चोट करती है। हमें झिंझोड़ती है। हमारी आँखें खोलने की कोशिश करती है। जीवन का सबसे बड़ा सच दिखाने का प्रयास करती है।
किसी ने वॉट्सएप पर एक सन्देश भेजा। पढ़ते ही इतना प्रासंगिक और सत्यपरक लगा कि मैंने इसे तुरन्त #अपनीडिजिटलडायरी के साथ साझा करने का निर्णय ले लिया। क्योंकि ‘डायरी’ धीरे-धीरे सही, पर ऐसी स्वस्थ, रोचक-सोचक, प्रेरक और सरोकार से पूर्ण सामग्री के प्रसार का जरिया बन रही है। तो ‘डायरी’ के पाठक भला क्यों इससे वंचित रहें। सन्देश कुछ इस तरह है...
----
मामला पूरी तरह निजी है। फिर भी विचार के लिए एक रोचक विषय है और सोचक यानि सोचनीय भी। क्योंकि इसी तरह के मामले अक्सर समाज में वैमनस्य और भेद के भाव का कारण बनते हैं। लेकिन पहले इस विमर्श का जो घटना आधार बनी, उस पर एक नज़र डाल लेते हैं।
एक छोटी सी कविता। बड़ा सा विचार। ये बताता है कि ख़ुशी की तलाश में भटकते हम दरअसल उसे अपने नज़दीक देख नहीं पाते। महसूस नहीं कर पाते।
बड़ी-बड़ी चीजों में उसे ढूँढ़ते रहते हैं। पूरी ज़िन्दगी इस तलाश में खपा देते हैं। लेकिन जब भी कभी मिलती है तो बेहद छोटी-छोटी सी चीजों में। कम वक़्त के लिए।
जब भी मिलती है तो छोड़ने का मन नहीं होता। लेकिन बड़ी चीजों में तलाशने का हमारा भ्रम, दुविधा और मृगतृष्णा हमेशा उसे हमेशा हमसे दूर ले जाता है।
और हम... बस, तलाशते रह जाते हैं। सहेज नहीं पाते।
----
ये सिर्फ़ दो-तीन मिसालें ही हैं। लेकिन शुरुआत से अब तक हिन्दी पत्रकारिता और उसके पत्रकारों के साथ लगभग स्थायी भाव से जुड़े संयोग-दुर्याोगों की मुकम्मल कहानी कहती हैं। एक-एक कर इन्हें समझने-देखने की कोशिश करते हैं।
1. उदन्त मार्त्तण्ड, नारद जयन्ती और तथ्यों का घालमेल :
क्या हम प्रतिभाओं को परखने में, उनका आकलन करने में गलती करते हैं? मेरे दिमाग में यह सवाल अक्सर ही आता है। बीते दो-ढाई दशक से बच्चों को क्रिकेट का प्रशिक्षण देने के दौरान ऐसे तमाम वाक़ये पेश आए हैं, जब बार-बार यह सवाल ज़ेहन में उभरा। और अभी जब किसी मित्र ने वॉट्सऐप पर मुझे भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान राहुल द्रविड़ का कथन (Quote) भेजा, तो सवाल फिर जीवन्त हो उठा।
वीडियो में दिख रहा ये छोटा सा बच्चा दिल्ली के मयूर विहार स्थित रयान इंटरनेशनल स्कूल में पढ़ता है। धैर्य जोशी नाम है इसका। इसी 26 जनवरी की बात है, जब ये सज-धजकर अपने ‘गणतंत्र दिवस’ और उसकी अहमियत के बारे में चन्द पंक्तियाँ बोल रहा था। निश्चित रूप से उसके शिक्षकों या माता-पिता ने उसे ये पंक्तियाँ रटवाई होंगी। पर उसने उन्हें इस ख़ूबसूरती से निभाया कि वहाँ मौज़ूद लोग उसे अपने मोबाइल कैमरों में कैद करने से ख़ुद को रोक नहीं पाए।
#अपनीडिजिटलडायरी पर पढ़ा... “झुकन झुकन से जानिए, झुकन झुकन पहचान। तीन जनें जादा (ज़्यादा) झुकें, चीता चाेर कमान।”
बढ़िया लिखा है... और जो लिखा गया है, मौज़ूदा लोक-व्यवहार में एक हद तक सही भी है।
पर दूसरा पहलू इसका उल्टा भी है - वृक्ष जब फलों से लद जाता है तो झुकता है
शायर भी कहते है, "यक़ीनन उसका क़द आपसे बड़ा रहा होगा। वो शख़्स जो आपसे झुककर मिला होगा।"
तीसरा पहलू भी है। कवि/शायर दुष्यन्त कुमार लिखकर गए हैं, “ये सारा ज़िस्म झुक कर बोझ से दुहरा हुआ होगा। मैं सज़दे में नहीं था, आपको धोखा हुआ होगा।”