सरकार ने अपने एक भाषा अधिकारी को बर्ख़ास्त कर दिया। इस अधिकारी का क़सूर केवल यह था कि उसने एक अनुवाद करते समय ऐसी हिन्दी लिख दी कि दिमाग़ पर थोड़ा जोर देने से वह समझ में आ गई थी। इसलिए हिन्दी अधिकारियों और भाषा अधिकारियों को लज्जित करने वाले इस अक्षम्य अपराध को गम्भीरता से लेते हुए उसे तुरन्त नौकरी से हटाने के निर्देश दे दिए गए।
वैसे तो ऐसे नाक़ारा देशभर में मिल जाएँगे, लेकिन इन दिनों मध्य प्रदेश में ये कुछ ज़्यादा ही पाए जा रहे हैं। अख़बार आए दिन ऐसे नाक़ारा लोगों की ख़बरों से भरे पड़े हैं। जिधर देखो, उधर कोई न कोई छोटा-बड़ा अफ़सर रिश्वत लेते पकड़ में आ रहा है। खलबली मची हुई है। पूरे सिस्टम पर सवालिया निशान लग रहे हैं। अब जितने मुँह, उतनी बातें...
“वाक़ई बड़ी शर्म की बात है। ऐसे ही लोगों की वज़ह से हमारी पूरी बरादरी बदनाम हो जाती है।”
बीते दिनों मध्य प्रदेश के एक शहर में 800 से भी अधिक पुलिसकर्मियों ने मार्चपास्ट किया। मक़सद अपराधियों में ख़ौफ़ पैदा करना था। इससे अपराधियों में ख़ौफ़ पैदा हुआ होगा, ऐसा माना जा सकता है। क्योंकि जिन क्षेत्रों के कस्बा निरीक्षक (टीआई), पुलिसकर्मी इत्यादि उस रैलीनुमा मार्चपास्ट में शामिल हुए, उन क्षेत्रों में उस दिन एक भी अपराध न होने की ख़बर है। वैसे, ख़बर के अलग-अलग अर्थ लगाने के लिए पाठक स्वतंत्र हैं।
बात उन दिनों की है, जब मैं स्कूल में पढ़ता था। माथुर सर, हमारे गणित के शिक्षक हुआ करते थे। उन्होंने मुझे छठवीं से आठवीं तक गणित पढ़ाई। आज जो भी थोड़ा-बहुत मुझे इस विषय का ज्ञान है, निश्चित तौर पर माथुर सर की वज़ह से। लेकिन उन्होंने मुझे एक और चीज सिखाई, जो जीवन में हमेशा काम आई। वह है, ईमानदारी।
मेरे शहर में दो सड़कें हैं। वैसे तो कई सड़कें हैं,लेकिन आज हम इन दो सड़कों की बात ही करेंगे। एक ख़ास सड़क है। वह उतनी ही ख़ास है जितना कि ख़ास कोई नेता या अफ़सर या जज या इनकी पत्नियाँ होती हैं। इसे कहने को ‘वीआईपी रोड’ कह सकते हैं। वैसे ये ख़ास रोड है तो ‘हुजूर’, ‘सरकार’, ‘जी मालिक’, ‘जी मालकिन’ टाइप के सम्बोधन अधिक फ़बते हैं। दूसरी आम सड़क है। ऐसी आम सड़कों की भरमार है। जिधर देखो, उधर आम ही आम सड़कें। यह वैसी ही आम है, जैसे मैं और आप। चूँकि ये आम सड़क है तो इन्हें प्यार से ‘अबे’, ‘ओए’, ‘स्साली’ जैसा कुछ भी कह सकते हैं। ये बुरा नहीं मानती। ह
ये बादल भी न, कभी बरसते हैं, कभी नहीं। कहीं ख़ूब बरसते हैं। कहीं बिल्कुल नहीं या बहुत कम। बादलों की इस मनमानी और इससे होने वाली कुछ मूलभूत किस्म की दिक्क़तों से ख़बरनवीस परेशान। सो, जैसे ही पानी से भरे बादल का टुकड़ा एक ख़बरखोजी की छत से गुजरा, उसने उसे धर लिया। इरादा सीधे दो-टूक बात करने का था। लिहाज़ा, बिना भूमिका सीधे सवाल-ज़वाब शुरू। शुरुआत, अलबत्ता, बादल के उस टुकड़े ने की क्योंकि उसे बीच रास्ते रोक जो लिया गया था...
बादल : कौन हो भाई? क्यों रोक लिया हमें?
रिपोर्टर : मैं रिपोर्टर। आपसे बहुत जल्दी से कुछ सवाल-ज़वाब करने हैं।
उस दम्पति को शादी-शुदा जीवन में करीब 60 साल हो चुके थे। वे आपस में हर बात एक-दूसरे से साझा करते थे। हर चीज पर बात करते थे। कुछ भी उनके बीच गोपनीय नहीं था। सिवाय एक छोटे से बक़्से के। पत्नी वह बक़्सा हमेशा अपने सिरहाने रखती थीं। उन्होंने पति को ताक़ीद की हुई थी कि उनकी इजाज़त के बिना उसे कभी छुएँ भी नहीं। खोलना तो दूर की बात है। पति ने भी पत्नी की इस ताक़ीद के ख़िलाफ़ कभी कोई कोशिश नहीं की।
सुबह नित्य कर्म, योगासन और ध्यान-स्नान से फ़ारिग होते ही वे अपने बालों को सँवारने के लिए हमेशा की तरह दर्पण के सामने थे। लेकिन बाल सँवारते-सँवारते आज उन्हें दर्पण में कुछ हलचल महसूस हुई। शायद दर्पण कुछ कहना चाहता है। हालाँकि दर्पण कहना तो काफी दिनों से चाहता था, लेकिन महसूस उन्होंने आज किया। पर उनके सामने कुछ कहने की क्या कोई मज़ाल कर सकता है? इसलिए उनके दम्भ को हल्की-सी ठेस लगी। वे एक कदम पीछे हो गए। फिर दर्पण से मुँह फेर लिया। लेकिन तभी उन्हें आवाज़ सुनाई दी, “राजन ओ राजन...”। यह आवाज़ दर्पण से ही आ रही थी।
काबुलीवाला ... हाँ, वही काबुलीवाला। याद ही होगा सबको। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ की कहानी का पात्र काबुलीवाला। पाँच साल की बच्ची मिनी का अधेड़ दोस्त काबुलीवाला। कोलकाता की गलियों में घूम-घूमकर सूखे मेवे (ड्रायफ्रूट्स) बेचता काबुलीवाला। मिनी में अपनी बेटी को याद करता काबुलीवाला।
उस वक्त शाम के 5.25 बज रहे थे। मैं जर्मनी में अपने एक ग्राहक के साथ उनके दफ़्तर में बैठा हुआ था। बातचीत जारी थी कि अचानक वह कुर्सी से उठते हुए मुझसे बोले, “निकेश, मुझे एक मिनट का वक़्त दो। मैं बस यूँ गया और यूँ आया।” इतना कहकर वे तेजी से दफ़्तर के बाहर निकल गए।
बमुश्किल दो मिनट बाद ही हाँफते हुए लौटे और मुझसे कहने लगे, “हाँ अब हम अपनी बातचीत जारी रख सकते हैं।” मैं अब तक कुछ समझ नहीं पाया था। इसलिए मैंने उनसे सवाल किया, “आख़िर हुआ क्या था माइकल?”