
मैं शिखा पांडे। अहमदाबाद में अपने छोटे से, प्यारे से परिवार के साथ रहती हूँ। मेरी दो प्यारी सी बेटियाँ हैं। अमिषी और श्रीतिजा। आज सुबह की बात है। मैं कुछ काम कर रही थी। तभी अमिषी मेरे पास आई और बोली, “मम्मा! मैं आपके जैसी कब दिखूँगी? आपके जैसी कब बनूँगी?” मैंने उससे पूछा, “तुम्हें मेरे जैसा बनना है? मेरे जैसा दिखना है?” तो उसका ज़वाब आया, “हाँ मम्मा! मुझे आपके जैसा बनना है। कब बनूँगी।” उसके लहज़े में स्वाभाविक मासूमियत थी। मनुहार भी। और मेरे लिए तो वो पल मानो ऐसा था, जिसे मैं शब्दों में बयान नहीं कर सकती। माँ के तौर पर मेरी ज़िन्दगी का सबसे यादग़ार लम्हा। हो भी क्यूँ न?” इस उम्र में जब बच्चे ये तक नहीं जानते कि उन्हें क्या बनना है, क्या नहीं। बस, टीवी में देखा या किसी काे देखा... डॉक्टर को देख लिया तो डॉक्टर बनना है। इंजीनियर को देखा तो इंजीनियर बनना है। वग़ैरह, वग़ैरह।
लेकिन मेरी बेटी को मुझ जैसा बनना है। उसकी यह ख़्वाहिश मेरे लिए बहुत मायने रखती है। उसका इतना सा कहना, मानो मुझे कहाँ ले गया। ऐसा लग रहा था, जैसे उसके लिए मेरा यह सब काम करना, घर की देखभाल करना, बहुत अहमियत रखता है। उसी दिन शाम को मेरी माँ का फोन आया। मैंने उन्हें भी यह बात बताई, “मम्मी, आज तुम्हारी नातिन ने मुझसे कहा है कि वह मेरी तरह, आपकी बेटी की तरह बनना चाहती है।” तो मेरी माँ ने कहा, “सही तो है। आख़िरकार बेटियाँ माँ की परछाई होती हैं।” सही कहा मेरी माँ ने, “बेटियाँ माँ की परछाई ही तो होती हैं।” मुझे नहीं मालूम आगे जाकर अमिषी का रोल मॉडल कौन होगा। हो सकता है, उसके पिता हों। लेकिन फख्र है मुझे इस बात का कि आज उसने पहला रोल मॉडल तो मुझे चुना है। उसने मुझे बताया कि सन्तान की पहली रोल मॉडल उसकी माँ ही होती है। और ये भी अहसास कराया कि क्यों होती है।
आख़िर माँ ही तो है जो बच्चों को सबसे पहले पेन्सिल उठाना सिखाती है और पैन तक तक लेकर जाती है। माँ ही है, जो पैन से (स्कूल) बैग तक लेकर जाती है। माँ ही है, जो नाम लिखना सिखाती है और सिग्नेचर तक लेकर जाती है। अमिषी की इस एक ख़्वाहिश ने कि “माँ, मुझे आप जैसा बनना है”, काफ़ी-कुछ बता दिया है मुझे। काश! मैंने भी अपनी माँ से ऐसा कुछ कहा होता। पर शायद मैंने ये कहा होगा उस वक्त कि मुझे ये बनना है, वो बनना है। हालाँकि आज तो मैं वही कर रही हूँ जो मेरी माँ किया करती है। घर की, घरवालों की देखभाल। बच्चों की परवरिश।.... क्या कहूँ। आँख भरी है पर ऑंसू नहीं निकल रहे हैं। बल्कि चेहरे पर वह मुस्कुराहट है, जो आज मेरी बेटी, मेरी अमिषी ने मुझे दी है।....आज अहसास हुआ है कि लोग सही कहते हैं, “बेटियों को कुछ सिखाने की ज़रूरत नहीं। वे तो सीखी-सिखाई आती हैं।”
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(शिखा, मूल रूप से मध्य प्रदेश की रहने वाली हैं। गृहिणी हैं। उन्होंने #अपनीडिजिटल डायरी को अपने अहसास से जुड़ा यह किस्सा ऑडियो के तौर पर रिकॉर्ड कर व्हाट्स ऐप के जरिए भेजा है। उनका ऑडियो साथ में दिया गया है।)

टिप्पणियाँ
pamit
08 / 13 / 20
पर्मालिंक
bahut khubsurat
bahut khubsurat
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