भारतीय दर्शन की उत्पत्ति कैसे हुई होगी?

भारतीय संस्कृति में समस्त विद्याओं का स्रोत यानि पैदा होने का स्थान वेद को माना जाता है। इसीलिए यह निश्चित है भारतीय दर्शन का मूल भी वेद ही हैं।

यह कहना गलत नहीं होगा कि भारतीय संस्कृति आध्यात्मिक स्तर पर अत्यधिक उन्नत संस्कृति रही है। कारण शायद ‘भौतिक समृद्धि’ रहा होगा। जब पेट भरा हो, तब भजन ठीक से होता है। भोजन से तन की भूख शान्त होती है। भजन मन की भूख शान्त करने के लिए किया जाता है। जब मन की भूख शान्त होती है, तो आत्म यानि स्वयं को जानने की भूख पैदा होती है। बस, यहीं से दर्शन की उत्पत्ति शुरू हुई होगी।

सोचकर देखें। भारतीय प्राचीन मानव कितना समृद्ध रहा होगा? वह भौतिक सम्पत्ति से ऊब गया होगा। भोग-विलास उसके लिए बहुत छोटी चीजें लगने लगी होंगी। ‘कामसूत्र’ का आचार्य मोक्ष चाहता है। फिर वह आध्यात्म की तरफ बढ़ा होगा। अपने आप की तरफ चला होगा। जो पिंड में वही ब्रह्माण्ड में। हम हैं तो उस परम सत्ता के एक कण ही। सो, उसके जैसे ही तो होगें? इसका परिणाम व्यक्ति के जीवन का लक्ष्य खुद को जानना हो गया। आत्म को जानना। जगत को जानना। सबके कारण को जानना। और वह चीख पड़ा "आत्मानम् विद्धि:"। मतलब 'स्व' का अन्वेषण करो, स्वयं को जानो, पहचानो, क्या हो तुम...

फिर मिला क्या? आनन्द परम् आनन्द। और आनन्द क्या है...

...‘अहम् ब्रह्मास्मि’। कमाल है ना! मैं खुद ईश्वर हूँ। ढूँढ लिया। खुद को जान लिया। खुद निकल पड़ा, पथ पर अकेला और कह उठा, “मैं ब्रह्म, मैं मुक्त, मैं अद्वैत, मैं चिरन्तन सत्य। बाकी सब माया, जिसका कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं।” 

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(अनुज राज, मूल रूप से बरेली, उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। दिल्ली में संस्कृत शिक्षक हैं। वे #अपनीडिजिटलडायरी के संस्थापक सदस्यों में से हैं। उनका यह लेख, उनकी ‘भारतीय दर्शन’ श्रृंखला की कड़ी है।)

Comments

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Anuj ji, you have great skill of expressing ur thoughts and knowledge in writing. Please share with all so that others may also get motivated . I advice and wish u to Persue further studies in ur respective subject. U have much more capabilities

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अनुज जी , शुरुआत बहुत अच्छी है। मेरी भी यही मान्यता है कि भारतीय संस्कृति अपने उदातग स्वरूप में, समृद्ध चिंतन परम्परा में, ज्ञान विज्ञान की उन्नति में, वाद-प्रतिवाद,तर्क वितर्क, इन सब म् तभी विकसित हो पाई जब हम भौतिक ऐश्वर्य से युक्त हो चुके थे,जीवन व्यवस्थित था, कोई न कोई शासन,न्याय प्रणाली आकार ले चुकी थी। कभी भी भूखा,कबीलाई,घुमक्कड़ समाज इतना उत्कृष्ठ चिंतन नही दे सकता। सबसे बड़ी बात भौगोलिक दृष्टि से भी देश के प्रत्येक भाग में ज्ञान विज्ञान चिंतन मनन की एक सी परम्परा अथवा एक से बढ़कर एक परम्परा के चिह्न विकसित होते है। अंतिम बात दर्शन का मूल उद्गम ऋग्वेद में साफ तौर पर है, कल्पना करें बाकी विश्व खाने और पहनने की सही दृष्टि भी विकसित नही कर पाया था,लेकिन भारीय ऋषि आत्मस्थ चिंतन में रत थे तब। आपको इस श्रृंखला के लिए अनेकशः शुभकामनाएं , हम सब लाभान्वित होंगे। डॉ रवि प्रभात, असिस्टेंट प्रोफेसर, संस्कृत विभाग, महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय ,रोहतक

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बहुत बढ़िया प्रयास है आज के इस प्रदुषित माहौल में शुद्धता का एहसास जैसा है

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Ghazab :)

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