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अनुज जी , शुरुआत बहुत अच्छी है। मेरी भी यही मान्यता है कि भारतीय संस्कृति अपने उदातग स्वरूप में, समृद्ध चिंतन परम्परा में, ज्ञान विज्ञान की उन्नति में, वाद-प्रतिवाद,तर्क वितर्क, इन सब म् तभी विकसित हो पाई जब हम भौतिक ऐश्वर्य से युक्त हो चुके थे,जीवन व्यवस्थित था, कोई न कोई शासन,न्याय प्रणाली आकार ले चुकी थी। कभी भी भूखा,कबीलाई,घुमक्कड़ समाज इतना उत्कृष्ठ चिंतन नही दे सकता। सबसे बड़ी बात भौगोलिक दृष्टि से भी देश के प्रत्येक भाग में ज्ञान विज्ञान चिंतन मनन की एक सी परम्परा अथवा एक से बढ़कर एक परम्परा के चिह्न विकसित होते है। अंतिम बात दर्शन का मूल उद्गम ऋग्वेद में साफ तौर पर है, कल्पना करें बाकी विश्व खाने और पहनने की सही दृष्टि भी विकसित नही कर पाया था,लेकिन भारीय ऋषि आत्मस्थ चिंतन में रत थे तब। आपको इस श्रृंखला के लिए अनेकशः शुभकामनाएं , हम सब लाभान्वित होंगे। डॉ रवि प्रभात, असिस्टेंट प्रोफेसर, संस्कृत विभाग, महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय ,रोहतक

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