रोज़ाना की तुलना में आज मेट्रो सूनी है। इतना सूनापन डराता है। हालाँकि आज दिल्ली में कर्फ्यू है। लेकिन ज़िन्दगी तो चल ही रही है। कुछ ज़िन्दगियाँ लड़खड़ा रही हैं, तो उन्हें सम्भालने की कोशिश में कई ज़िन्दगियाँ लगी हैं। इस क्रूर समय में यही एक ख़ूबसूरत बात है।
मेट्रो में एक लड़का हैरान-परेशान है। बार-बार पानी पी रहा है। लगातार कहीं फ़ोन मिलाने की कोशिश कर रहा है। खीझ रहा है। बात नहीं हो पा रही है। एकाध जगह बात हुई तो "सलाम अलैकुम" से आगे नहीं बढ़ पाई। मास्क के ऊपर आँखें गीली हैं। माथे पर पसीने की सीलन है।
किताबें ज्ञान का स्रोत हैं या फिर ज्ञान किताबों के सृजन का माध्यम? इस प्रश्न पर विचार का भरा-पूरा कारण दिया है इस कविता ने। प्रश्न के मद्देनज़र इस कविता की हर लाइन गौर करने लायक है।
मराठी संस्कृति वृहद और समृद्ध है। इसके कई अच्छे गुणों में संस्कार से लेकर खान-पान, पहनावा और घर परिवारों का रखरखाव भी महत्वपूर्ण है। इसके लिए कल्पना और अभिव्यक्ति की बहुत ठोस जरूरत होती है। महिलाओं ने इस ज़िम्मेदारी को बख़ूबी निभाया है। बल्कि इसे अक्षुण्ण बनाए रखा है।
हिन्दी के लेखक लोग #NoToFree चला रहे हैं, माने मुफ़्त में कुछ नहीं। इसके विरोध में मेरा #YesToFree है। मैं सभी तरह के कार्यक्रमों, मंचों, शादी, बियाह, जनेऊ, मुंडन के लिए उपलब्ध हूँ। कुछ श्रद्धा से खर्चा-पानी दे दीजिएगा। एक समय का मैथिल भोजन काफ़ी है। रसगुल्ला न मिले तो गुलाबजामुन चलेगा। इक्यावन व्यंजन का जोर न देंगे, ग्यारह से काम चल जाएगा।
जिस उम्र में लोग आधुनिकता और दुनियावी चमक-दमक के पीछे भागते हैं, उस उम्र में कुछ युवा ऐसे भी हैं, जो संस्कृत और संस्कृति को चमका रहे हैं। उसे निखार रहे हैं। उसकी नई परिभाषाएँ गढ़ रहे हैं।
ऐसे युवाओं में कुछ नाम हैं - शुभम आर्यन्, गौरव मलिक, शौर्य नान्दल और संजू नान्दल। इन युवाओं ने 25 मार्च को ही एक वीडियो ज़ारी किया है। होली के अवसर पर, संस्कृत भाषा में, भारतीय संस्कृति के रंगों से सजे पर्व की शुभकामनाएँ देने के लिए।
वीडियो में सुने जा रहे गीत के बोल हैं...
माँ अब बदल रही है। पर कितनी, कहाँ। और कहाँ नहीं। वक़्त के साथ उसका बदलना कितना ज़रूरी है। इस कविता में ऐसे कुछ पहलू छूने की कोशिश की गई है। कविता के साथ ही महिलाओं की तरफ़ एक महिला की महात्वाकाँक्षी पुकार भी है.. ..‘खोल दो बन्धन इनके, हर मंज़िल पा जाएँगी!
नगर कीर्तन, सदियों पुरानी एक विशुद्ध भारतीय परम्परा। सुबह-सुबह कुछ लोग जब हरिनाम संकीर्तन, भक्तिपद गाते हुए हमारे दिन को ‘सुदिन’ बनाने के मकसद से गलियों, चौक-चौबारों से गुजरते हैं, तो वह ‘नगर कीर्तन’ कह दिया जाता है। यही नगर कीर्तन तब ‘प्रभात फेरी’ हो जाता है, जब समाज में जागरुकता लाने, लोगों का ध्यान किसी मसले की तरफ़ खींचने के लिए उस विषय का काव्य कहते हुए लोगों के समूह यूँ ही हमारे दरवाजों से गुजरा करते हैं। मिसाल के तौर पर बहुत लोगों को बचपन की प्रभात फेरियाँ अब भी शायद भूली न होंगी। हर 15 अगस्त की सुबह विद्यालयों की गणवेष (Uniform) पहने बच्चे आज़ादी के तराने गाते, हमें सुनाते निकला करत
धर्म, जाति, भाषा के नाम पर एक-दूसरे के ख़िलाफ़ खड़े होने की सूचना-सामग्री अथाह है। समाचार माध्यमों और कथित सामाजिक माध्यमों (Social Media) पर ऐसा कुछ एक ढूँढ़ने जाएँ, तो सैकड़ों की तादाद हाथ में आती है। पर उसी अँधेरी खोह में कोई टिमटिमाती सी एकाध रोशनी भी कभी मिल जाती है। जैसे यह वीडियाे। इसे किसने बनाया? इसमें दिख रहे कलाकार कौन हैं, कहाँ से हैं?
ये एक विज्ञापन है। लेकिन बेहद प्रासंगिक, संवेदनशील और सामाजिक सन्देश देने वाला। सामाजिक इसलिए क्योंकि मातृशक्ति रूप बेटियों की अहमियत हमेशा ही कम आँके जाने जैसे मसले को छूता है। संवेदनशील इसलिए क्योंकि यह सिर्फ़ स्त्री ही नहीं, समाज में बेहद उपेक्षित जीवन जीने वाले हिजड़ों की संवेदनाओं तक भी पहुँचता है। और प्रासंगिक इसलिए क्योंकि ये अंग्रेजी अवधारणा वाले मातृ दिवस (मदर्स डे) पर जारी हुआ था, जबकि इस वक्त पूरा देश भारतीय संस्कृति वाला नौ-दिनी मातृदिवस मना रहा है।
भारतीय महिला हॉकी टीम ने प्रशंसनीय पहल की है। ऐसी, जो आम आदमी के ‘सरोकार’ से जुड़ी है। ओलम्पिक चैनल (olympicchannel) नाम की वेबसाइट के मुताबिक भारतीय महिला हॉकी टीम की सदस्य देश में ‘स्तन कैंसर’ के ख़िलाफ़ जागरुकता अभियान का हिस्सा बन रही है। यह अभियान ‘आरोग्य’ नाम का एक ग़ैरलाभकारी संगठन चला रहा है। यह संगठन कैंसर के इलाज से जुड़े शोध में भी शामिल है। संगठन के संस्थापक डॉक्टर प्रियांजलि दत्ता और ध्रुव काकेर हैं।