भारतीय महिला हॉकी टीम टोक्यो ओलम्पिक खेलों में चौथे नम्बर रही। शुक्रवार, छह अगस्त को ब्रिटेन ने नज़दीकी मुकाबले में भारत की टीम पर चार-तीन से जीत हासिल की। यह वही ब्रिटिश टीम है, जिसने शुरुआती मुकाबले में भारत काे चार-एक से हरा दिया था। पिछले ओलम्पिक की स्वर्ण पदक विजेता थी। लेकिन इस बार वह काँस्य पदक के लिए भारत से मुकाबल
भारत की समृद्ध गुरु-शिष्य परम्परा अगर कहीं अब भी अपने श्रेष्ठ स्वरूप (कुछ अगर-मगर छोड़ दें, तो बहुतायत) में है तो वह या तो आध्यात्म का क्षेत्र है या संगीत का। इसमें संगीत की बात करें तो सालों-साल की साधना से अपनी विधा में जो शिष्य थोड़े पक जाते हैं, वे अक्सर अपनी तैयारी के प्रदर्शन से गुरु/गुरुओं को स्वरांजलि, आदरांजलि दिया करते हैं।
बीते दो-तीन दिनों राज्यसभा के सदस्य प्रोफेसर मनोज झा का सदन में दिया यह भाषण ख़बरिया ( Media) और सामाजिक माध्यमों (Social Media) पर चल रहा है। चल क्या रहा है, छाया हुआ है। लोग उनके भाषण की तारीफ़ कर रहे हैं। तारीफ़ के काबिल है भी। क्योंकि आजकल के नेताओं से ऐसी उम्मीद कम ही की जाती है कि वे आम नागरिकों की ज़िन्दगी और मौत से जुड़े मुद्दों पर इतनी नज़दीकी संवेदनशीलता से बोलेंगे।
उसका घर कॉलोनी के नुक्कड़ पर है। सामने तीन तरफ़ जाने वाले रास्ते तिकोने से जुड़ते हैं। वहीं एक तरफ़ उस रिहाइश (कॉलोनी) का दरवाज़ा है। उसके घर के बाहरी चबूतरे से चिपका हुआ। उस दरवाजे का, घर के सामने वाला जो पल्ला है न, उसके ठीक पीछे एक पत्थर की फर्शी रखी है। गन्दे नाले का एक उधड़ा सा मुँह बन्द करने के लिए। मगर अज़ीब-व-गरीब हाल ये कि वह फर्शी गन्दे नाले का मुँह तो बन्द कर देती है लेकिन रईस दिमागों की गन्दगी को रोज़ ही उघाड़ दिया करती है।
जूही चावला अपने समय की लोकप्रिय अभिनेत्री हैं। उन्होंने अभी हाल ही में दिल्ली उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की थी। समाजसेवी, स्तम्भकार वीरेश मलिक और टीना वाचानी भी उनके साथ थे। याचिका में एक अहम मसला उठाया गया। दूरसंचार क्षेत्र में 5जी तकनीक के परीक्षण का। इस तकनीक के फ़ायदों पर जितनी चर्चा है, उतनी ही पूरी दुनिया में इसे लेकर आशंकाएँ भी तमाम हैं। याचिका में बताया गया कि बेल्जियम ने ब्रशेल्स शहर में इस तकनीक के परीक्षण पर अप्रैल-2019 में रोक लगा दी थी। वहाँ की संसद ने इसी साल पांच मई को फिर इस मसले पर विचार किया और 5जी तकनीक के परीक्षण की अनुमति न देने का निर्णय किया। ऐसे ह
साल 2016 में एक फिल्म आई थी, ‘पिंक’। समाज में महिलाओं की व्यथा, उनकी पीड़ा, उनके संघर्ष को दिखाती एक कहानी। इसी फिल्म में एक कविता थी, ‘तू चल, तेरे वज़ूद की समय को भी तलाश है’। इन ख़ूबसूरत लब्ज़ों को अपनी कलम से कागज़ पर उतारा था, गीतकार तनवीर ग़ाज़ी ने। जबकि आवाज़ दी थी, हिन्दी सिनेमा के सबसे बड़े सितारे की हैसियत पा चुके अमिताभ बच्चन ने।
ये पहला वीडियो मध्य प्रदेश के भोपाल शहर के ‘आम शख़्स’ योगेश बलवानी का है। और दूसरा शहर के बड़े ‘ख़ास अस्पताल’ चिरायु के प्रबन्धक गौरव बजाज का। ये अस्पताल इतना ख़ास है कि जब मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और उनके जैसे दूसरे बड़े सत्ताधारी विशिष्ट जन कोरोना संक्रमित होते हैं, तो यहीं का रुख़ करते हैं। फिर ठीक होकर लौटते भी हैं।
देश के जाने-माने चित्रकार, कहानीकार, संपादक, आकाशवाणी अधिकारी और टेलीफिल्म निर्माता प्रभु जोशी जी ने इसी चार मई को हमेशा के लिए आँखें बन्द कर लीं। वे कोरोना संक्रमित थे। लेकिन जाने से पहले से अपने इस वीडियो के जरिए भाषायी सरोकार पर हमारी आँखें खोलने का प्रयास भी कर गए। वे बता गए कि कैसे हमारी राष्ट्र भाषा और क्षेत्रीय भाषाओं को ख़त्म करने की मानो कोई साज़िश हो रही है। और हम उस साज़िश में जाने-अनजाने हिस्सेदार बन रहे हैं। साथ ही हमें चेता गए कि अगर हम आज सचेत नहीं हुए तो सम्भवत: कल को हमारी पहचान का संकट भी हमारे सामने उपस्थित हो सकता है।
वक़्त मुश्किल है। एक अदृश्य दुश्मन (कोरोना) है, जिसने मानवता के ख़िलाफ़ जंग छेड़ रखी है। हमारे घरों में घुसकर हमारे अपनों को वह हमसे छीन रहा है। व्यवस्थाएँ पस्त हैं और अव्यवस्थाएँ मस्त। पूरा माहौल निराशाजनक है।
लेकिन वास्तव में यही हमारे लिए परीक्षा की घड़ी है। घनघोर निराशा के अन्धकार में भी हमें अपने आप पर यक़ीन करना होगा। ईश्वर पर भरोसा रखना होगा। ये मानना होगा कि जल्द ही सब ठीक हो जाएगा। उम्मीद का दीया जलाए रखना होगा।