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अनुज महोदयः साधुवाद। उदरनिमित्तं बहुकृत वेष प्रधान जहाँ हो वहाँ यही होगा। पाली में लिखी त्रिपटक उपनिषदों का अनुसरण करते हुए अपनी बात सुनाकर बाहरी तामझाम में न बहते रहने की बात सुनाता है। बुद्धि जगी नहीं बौद्ध कहलाने लगे। इसकी जरूरत जिनको है वे भेदभाव तो क्या दर्शन से दूर रहते हैं। आपकी शोधात्मक दृष्टि है। उनकी नहीं जो मनभेद और मतभेद की खिचडी खा और खिला रहे हैं।

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