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चटपटी मसालेदार बातें जो अक्सर हक़ीक़त से दूर ही रहती हैं । मुझे लगता है जो सुकरात करते थे वैसा करना बहुत मुश्किल है आमतौर पर तो न ही है । ऐसा शायद इसलिए भी की इंसान की फितरत में ही जिग्ग्यासा है । हमे दूसरे के बारे कुछ भी बेशक ऊलजलूल बात ही क्यों न हो मगर सुनने में दिलचस्पी रहती है । हालांकि सुकरात की तरह हर बात को ग्रहण करने और न करने की प्रैक्टिस न मुमकिन नहीं है और लगातार प्रैक्टिस करने के बाद शायद वैसे मुकाम पाया भी जा सकता है।

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