
एक दीवार है, जो गाढ़ी नीली रँगी है। जब कमरा बना था, तो इस पिछली दीवार को गाढ़ा नीला रंग लगाया था। ठीक पिछले पड़ोसी की दीवार से लगकर इसे कंक्रीट की छत पर उठाया था, जो अब इस कमरे की ज़मीन बन गई है।
तीन हल्के नीले रंगों के बीच गाढ़े रँगीले नीले रंग पर एक छोटा सा बल्ब भी टाँग रखा है। वो भी गहरा नीला है। सिर्फ़ उजाले से ही नही, बल्कि अपने होने से भी।
बरसों पहले, कोई एक नीला शर्ट हुआ करता था। एक कॉपी, जिसका कव्हर नीला था। थोड़ा बड़ा हुआ, तो स्कूल का पैंट भी नीला।
फिर कूची पकड़ी, तो सफेद कैनवास पर दो पेड़, एक नदी, एक झोपड़ी और नीले आसमान में उगते सूरज और पक्षियों को बनाते हुए नीले रंग की शीशी बहुत भाती थी। वो कभी ढुलक भी जाती, तो लाल पत्थर को नीला कर देती।
इस नीले रंग को अपने भीतर की नसों में भी पाता हूँ। आठवीं कक्षा में धमनी, शिरा में अन्तर करते हुए अपने हाथ की चमड़ी के भीतर अशुद्ध रक्त को बहाकर ले जाती शिरा को देखता - फूली हुई सी।
कभी बीमार पड़ता, तो डॉक्टर के पास जाने पर वह बाएँ हाथ की नब्ज़ पकड़ता और पंजे से कोहनी तक के सपाट हिस्सों पर नीली नसें फूल जातीं। उनका नीलापन उभर आता।
यह अशुद्ध नीला रंग, कब मेरे दिल दिमाग़ में समा गया, नही मालूम।
पर फिर नील, नीला आसमान, नीला फूल, नीलाभ, नीला समन्दर, नीली नदियाँ, नीली आँखों वाली लड़कियाँ...हर कुछ जो नीला था क़ायनात में, सब अपना हो गया।
एक बार किसी ने पूछा कि पेड़ का रंग कैसा हो... फूलों का...गिलहरी या चींटी का....तो मैंने बहुत सोचकर देर से ज़वाब दिया - नीला।
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(संदीप जी स्वतंत्र लेखक हैं। यह लेख उनकी ‘एकांत की अकुलाहट’ श्रृंखला की पहली कड़ी है। #अपनीडिजिटलडायरी की टीम को प्रोत्साहन देने के लिए उन्होंने इस श्रृंखला के सभी लेख अपनी स्वेच्छा से, सहर्ष उपलब्ध कराए हैं। वह भी बिना कोई पारिश्रमिक लिए। इस मायने में उनके निजी अनुभवों/विचारों की यह पठनीय श्रृंखला #अपनीडिजिटलडायरी की टीम के लिए पहली कमाई की तरह है। अपने पाठकों और सहभागियों को लगातार स्वस्थ, रोचक, प्रेरक, सरोकार से भरी पठनीय सामग्री उपलब्ध कराने का लक्ष्य लेकर सतत् प्रयास कर रही ‘डायरी’ टीम इसके लिए संदीप जी की आभारी है।)
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Comments
Laptop Baba (not verified)
12 / 5 / 21
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सब पढ़ लीया
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